Sunday, May 6, 2012

Scheduling अनुसूची


Scheduling
समाजिक शोध के क्षेत्र में तथ्य संकलन के लिए जिन विधियों का प्रयोग किया जाता है उनमें एक अनुसूची है। इसमें प्राथमिक और द्वितियक स्त्रोंत होते हैं। प्राथमिक स्त्रोत के अन्र्तगत घटनाओं को स्वंय देखकर, सुनकर या संबंधित व्यक्तिओं से मिलकर तथ्यों को एकत्रित किया जाता है। द्वितीयक स्त्रोतों के अन्र्तगत अध्ययनकर्ता विषय से संबंधित प्रलेखों का अध्ययन कर तथ्य एक़ित्रत करता हैं। समाज की विभिन्न समस्याओं के अध्ययन के लिए सामाजिक शोध के क्षेत्र में प्रश्नावली और सूची बनाने का व्यापक महत्व होता है बाहरी रूप से यह दोनो काफी हद तक समान दिखते हैं लेकिन वास्तविक अर्थो में इन दोनो की प्रकृति और आयोग की प्रक्रिया एक दूसरे से अलग होती है।
परिभाषा-
    सामाजिक शोध के क्षेत्र में अनुसूची तथ्य को एकत्रित करने के लिए महत्वपूर्ण विधि हैं
पीवी यंग और गुड्डे एवं हॉट के अनुसार अनुसूची प्रश्नों की वह सूची है जिसका प्रयोग साक्षात्कार के दौरान सामाजिक समस्याआ के अध्ययन में किया जाता है।
लुण्डबर्ग के अनुसार अनुसूची का प्रयोग उत्तरदाता से पूछे जाने वाले प्रश्नों को याद करने से शोधकर्ता को बचाता है। क्योंकि शोधकर्ता के साथ प्रश्नों की सूची रहती है। और वह उत्तरदाता से एक जैसे प्रश्न पूछता है। अनुसूची एक सामान्य अवधारणा है जिसका प्रयोग किसी भी प्रणाली द्वारा तथ्यों के सग्रंह मंें किया जाता है।
बेगार्डस के अनुसार अनुसूची उन तथ्यों को प्राप्त करने की औपचारिक प्रणाली का प्रतिनिधित्व करती है जो वैषयिक रूप में है। तथा सरलता से प्रत्यक्ष योग्य है।
विशेषताएं-
एक अच्छी या उत्तम अनुसूची प्रश्नों और उत्तरों की गुणवत्ता पर निर्भर करती है। अर्थात प्रश्न इस प्रकार होना चाहिए जिससे वास्तविक तथ्य मालूम किए जा सकें। साथ ही प्रश्नों का सूचनादाता सही अर्थो में समझकर उचित उत्तर दे सके। एक बेहतर अनुसूची में निम्नलिखित विशेषताएं होती हैं।
1 सही संदेश वाहन- एक अच्छी अनुुसूची की पहली विशेषता यह है कि इसमें प्रश्नों को इस प्रकार पूछा जाता है कि उन प्रश्नों के संंबंध में किसी भी उत्तरदाता के मन में कोई गलत धारणा न पनप पाए। अर्थात शोधकर्ता के द्वारा पूछे गए प्रश्न उसी रूप में उत्तरदाता को मिले। अनुसूची की भाषा सरल, स्पष्ट, भ्रमरहित और अर्थ प्रदान करने वाली होना चाहिए।
2 सही प्रत्युतर- उत्तम अनुसूची की दूसरी विशेषता के रूप में सही प्रत्युतर प्राप्त होना होती है। इसकी पहचान तभी कायम होती है जब उस अनुसूची के आधार पर सूचनादाता सही उत्तर देता है जो शोधकर्ता के लिए उपयोगी और आवश्यक होता है। सही प्रत्युतर का मायना यह है कि सूचनादाता द्वारा दी गई जानकारी वास्तविक हो और उसमें कोई दुविधा न हो।
3 प्रश्नों का उचित क्रम- एक अनुसूची में प्रश्नों का क्रमबद्ध तरीके से लिखा जाना चाहिए ताकि उनमें आंतरिक संबंधता आ सके और उत्तरदाता सभी प्रश्नों की व्यवस्थित रूप में जानकारी दे सके ।
4 सरल और स्पष्ट प्रश्न- एक अच्छी अनुसूची में प्रश्न सरल और स्पष्ट भाषा में होना चाहिए ताकि उत्तरदाता को प्रश्न समझने में आसानी रहे। हालांकि इस विधि में सूचनादाता और प्रश्नकर्ता एक दूसरे के समक्ष रह कर चर्चा करते है उसके बाद भी इस बात का ध्यान रखा जाना चाहिए कि प्रश्न सरल और स्पष्ट हों।
5 सीमित आकार - प्रश्नों की संख्या समस्या की प्रकृति पर निर्भर करती है फिर भी एक अच्छी अनुसूची का आकार निश्चित होना चाहिए इसमें अनुसंधान की समस्या से संबंधित प्रश्नों को ही शामिल किया जाना चाहिए।
6 क्रास प्रश्नों की व्यवस्था- एक अच्छी अनुसूची उसे माना जाता है जिसमें समस्या से संबंधित विभिन्न पहलुओं के बारे में क्रास प्रश्न पूछे जाने की व्यवस्था हो ताकि सूचनादाता द्वारा दी गई जानकारी की जांच प्रश्नों के आधार पर की जा सके।
7 सामान्य शब्द- अनुसूची में सामान्य शब्दों का प्रयोग किया जाना चाहिए अध्ययनकर्ता को अनुसूची में खड़ी बोली का प्रयोग नहीं करना चाहिए। हमेशा सीधे और बोल चाल वाले शब्द ही प्रयोग में लाने चाहिए।
8 सम्मानजनक प्रश्न- इसमें हमेशा सम्मानजनक प्रश्नों का ही प्रयोग किया जाना चाहिए ताकि उत्तरदाता को किसी भी प्रकार का आघातों न पहुंचे। आमतौर पर अध्ययनकर्ता को प्रश्नों में विकट शब्दों के प्रयोग से बचना चाहिए।
9 सांख्यिकीय विवेचना - इसमें ऐसे प्रश्नो का समावेश होना चाहिए ताकि अध्ययनकर्ता उत्तरदाताओे द्वारा दी गई जानकारी के आधार पर तथ्यों की सांख्यिकीय विवेचना कर सके।
10 सूख का अनुभव - इसके अलावा प्रश्न ऐसे हो जिससे सुख का अनुभव हो साथ ही छोटे प्रश्नो का उपयोग भी होना चाहिए। प्रश्न ऐसे होना चाहिए जो अध्ययन के विषय की प्रकृति और उद्देश्य से संबंधित हो ।

अनुसूची प्रश्नों की एक सूची होती है। इसका निर्माण सोच समझकर सावधानीपूर्वक किया जाता है। यह निर्माण करना कोई सरल कार्य नहीं होता है। इसके निर्माण की प्रक्रिया के विभिन्न स्तर होते हैं। यह स्तर निम्नलिखित हैं।
1  अनुसूची निर्माण के पहले चरण में इसके निर्माण से संबंधित विभिन्न पक्षों पर विचार किया जाता है। इसके निर्माण के पहले यह निश्चित कर लेना चाहिए कि इसमें अध्ययन विषय से संबंधित किन किन विषयों को सम्मिलित किया जाएगा। इस स्तर में शोधकर्ता अध्ययन की समस्या के संबंध में जानकारी प्राप्त करता है। ऐसा करना इसलिए आवश्यक होता है क्योंकि अगर अध्ययन की समस्या की प्रकृति का पूर्ण ज्ञान नहीं होगा तब तक उसके संबंध में प्रश्नों का ज्ञान भी नही हो सकेगा। इससे शोधकर्ता को यह पता चल जाता है कि विषय में कौन कौन से पक्ष अधिक और कौन कौन से कम महत्वपूर्ण हैं। इसके अलाव अध्ययन की समस्या के मुख्य पहलुओं का भी पता चल जाता है जिनके माध्यम से विभिन्न पहलुओं के बारे में जानकारी प्राप्त की जा सकती है। पहले से ऐसा कर लेने से अनुसूची में प्रश्नों का एक संतुलित अनुपात बनाए रखना संभव हो पाता है। साथ ही इसमें अनावश्यक प्रश्नों का जमाव होने से भी बचा जा सकता है। पूर्ववर्ती विचार और समस्या के संबंध में आवश्यक जानकारी इसलिए भी आवश्यक होती हैं क्यों कि शोधकर्ता विषय के संबंध में एक संतुलित धारणाओं को पनपाए बिना ही अनुसूची में उन सभी मदों और पहलुओं को सम्मिलित करना चाहते हैं। जो उन्हे महत्वपूर्ण और रूचिकर प्रतीत होतो हैै। इस प्रवृत्ति से धन,समय और शक्ति का अपव्यय होता है। इस स्थिति से बचने के लिए एक संतुलित प्रश्न सूची को बनाए रखना आवश्यक होता है। इसको बनाए बिना यह संभव है कि कुछ महत्वहीन पक्षों को  अनुसूची में मान्यता मिल जाए और महत्वपूर्ण पक्ष अनुसूची से छुट जाए। इस लिए पूर्व ज्ञान के आधार पर अध्ययन समस्या के संबंध में जानकारी प्राप्त की जाती है।
 
2  दूसरे चरण में इसका आकार निर्धारित किया जाता है। इस स्तर में शोधकर्ता यह निश्चित करता है कि अनुसूची के अंदर कितने प्रश्न रखें जाएं। अनुसूची का आकार, समस्या की प्रकृति, अध्ययन क्षेत्र की प्रकृति, अध्ययन के लिए प्राप्त धनराशि और समय आदि पर निर्भर करती है। अध्ययन विषय को विभिन्न पक्षों में विभाजित किया जाता है। साथ ही यह भी सुनिश्चित किया जाता है कि प्रत्येक उपविभाग के संबंध में सभी विषय स्पष्ट हो। इसके लिए दो बातों का ध्यान रखना आवश्यक होता है। इसमें पहली बात यह है कि इस प्रकार के प्रश्नों को अनुसूची में सम्मिलित करने पर पहलू विशेष पर अधिक ध्यान दिया जाए। दूसरी बात यह कि इस प्रकार के प्रश्नों के उत्तरों से प्राप्त सूचनाओं का शोध के उद्देश्य की पूर्ति में अधिकाधिक उपयोग हो। इस प्रकार यह कहा जा सकता है कि इस स्तर में अध्ययन विषय के विभिन्न पक्षों के उपविभागों और उनसे संबंधित प्रश्नों के विस्तार, प्रकृति और उसकी उपयोगिता के विषय में निश्चित कर लिया जाता है। अगर मनोवृत्ति, भावनाओं ओर विचार आदि मनोवैज्ञानिक समस्याओं के अध्ययन के लिए अनुसूची का निर्माण किया जाता है तो इसका आकार बड़ा रखा जाता है। इसके विपरित घरेलू दशा, साक्षरता, व्यवसाय और पोशाख स्टाईल आदि समस्याओं के अध्ययन के लिए अनुसूची का निर्माण किया जात है तो अनुसूची का आकार छोटा रखा जाता है। साथ ही अगर अध्ययन के लिए धनराशि एवं समय अधिक प्राप्त रहता है। तब तुलनात्मक रूप में अनुसूची का आकार बडा रखा जाता है एवं यदि धनराशि और समय कम रहता है तब अनसूची का आकार छोटा रखा जाता है।
3  अनुसूची के निर्माण की प्रक्रिया का तीसरा स्तर प्रश्नों के निर्माण से संबंधित होता है। इस स्तर पर इस बात की सावधानी रखनी पड़ती है कि जल्दबाजी में प्रश्नों का निर्माण न हो जाए। प्रश्नों की प्रकृति पर ही यह निर्भर करता है कि उत्तरदाता उन प्रश्नों के सही अर्थ को समझकर सही उत्तर दे सकेगा या नहीं । इसलिए इस बात का हमेशा ध्यान रखा जाना चाहिए कि प्रश्नों की भाषा जटिल, अस्पष्ट, संदेहयुक्त और बहुअर्थक न हो । साथ ही जिन प्रश्नों से उत्तरदाताओं को कोई क्षोभ पहुंचे या उत्तर देने में किसी प्रकार का संकोच हो, ऐसे प्रश्नों के निर्माण से भी बचा जाना चाहिए। सरल, स्पष्ट और ठीक ढंग से पूछे गए विनम्र प्रश्न उत्तरदाता से सही उत्तर स्वयं ही प्राप्त कर लेता है। जबकि गलत ढंग से पूछे गए प्रश्न उत्तरदाता के मन को विचलित कर देते है। जिसके चलते वह या तो उत्तर नहीं देता और देता भी है तो अनमने ढंग से । विषय से संबंध न रखने वाले प्रश्नों को भी शामिल नही किया जाना चाहिए। कहने का तात्पर्य यह है कि प्रश्नों का निर्माण सावधानीपूर्वक किया जाना चाहिए ताकि प्रश्न विश्वसनीय तथ्य संग्रह करने में सक्षम हों। प्रश्नों का निर्माण करते समय इस बात का ध्यान रखा जाता है कि समस्या के विभिन्न पहलूओं के संबंध में विस्तृत और विश्वसनीय आंकड़े इन प्रश्नों द्वारा प्राप्त हो सके। हर संभव प्रयास किया जाना चाहिए कि अनुसूची में कई अर्थो वाले या फिर उत्तरदाताओं को विचलित करने वाले प्रश्नों का चयन नही करना चाहिए।
4  चैथे स्तर में प्रश्नों को एक सिल- सिलेवार ढंग से क्रमबद्व सजाया जाता है। इस समस्या से संबंधित सभी प्रश्न को एक ही जगह रखा जाता है। साथ ही यह भी ध्यान रखा जाता है कि उत्तरदाताओं की आसानी के लिए कैसी क्रमबद्धता होनी चाहिए। उत्तरदाताओं का नाम, लिंग, आयु, ज्ञान, धर्म, वैवाहिकी, स्थिति, आमदनी और व्यवसाय आदि की जानकारी से संबंधित प्रश्नो का सबसे उपर और मुख्य प्रश्नों को नीचे रखा जाना चाहिए। लेकिन सबसे उपर अध्ययन की समस्या के विषय का उल्लेख भी किया जाना चाहिए। यदि इसमें उस विषय के उद्देश्य भी दिया गया हो तो यह और भी अच्छा माना जाता है। प्रश्नो का क्रम में बनाने से उत्तरों के माध्यम से तथ्यों की प्राप्ति उसी क्रम में होती है, जिस क्रम में तथ्यों की व्याख्या, विश्लेषण और रिपोर्ट लिखनी होती है। क्रम से लगे प्रश्नों के द्वारा उत्तरदाता से भी शीघ्रता से उत्तर मिल जाता है। सरल से जटिलता की ओर प्रश्न का क्रम होने से उत्तरदाता सरल प्रश्नों को पहले करके जटिल के लिए मानसिक तौर पर तैयार भी हो जाता है। क्रमबद्वता के दौरान यह भी ध्यान रखना चाहिए कि ऐसा कोई प्रश्न न शामिल न हो जिसका उत्तर न मिल सके ।
5  अनुसूची निर्माण की अंतिम प्रक्रिया अनुसूची की सार्थकता की जांच करने से संबंंधित होता है। अर्थात प्रश्नों को क्रमबद्व रूप में रखने के बाद अनुसूची के दोषों की जानकारी प्राप्त करने के लिए पूर्व- परीक्षण या सर्वेक्षण कराया जाता है। इसके अलावा कुछ पर अनुसूची लागू कर देखा भी जाता है कि उसमें कोई अनावश्यक प्रश्न तो शामिल  नही है। अगर कोई प्रश्न छूट गया है तो उसका भी पता चल जाता है। अनुसूची को दोषरहित और अधिक सार्थक बनाने के उद्दश्य से पूर्व सर्वेक्षण किया जाता है। पूर्व- सर्वेक्षण के अनुभव के आधार पर अनुसूची में संशोधन  किया जाता है और अंतिम रूप अनुसूची का निर्माण किया जाता है। ऐसा कर लेने से आगे आने वाली समस्याओं का निराकरण हो जाता है।

Types of scales
किसी भी अध्ययन को यथार्थता और वैज्ञानिकता प्रदान करने के लिए निश्चित अनुमापन  बहुत आवश्यक होता है। सामाजिक विज्ञान में अध्ययन को यर्थाथ बनाने के लिए समाजिक घटना के गुणात्मक और गणनात्मक दोनो पक्षों का अध्ययन अनिवार्य होता है। इस प्रयास का परिणाम अनेक मापक यंत्रों, पैमानों अनुमापों अथवा स्केलिंग प्रविधियों का निर्माण है जिनकी सहायता से विभिन्न सामाजिक घटनाओं और समस्याओं के प्रति लोगों की मनोवृत्तियांें, नजरिया और दूरी को मापा कर इनका मूल्याकन किया जा सकता है।
अनुमापन या पैमाने किसी सामाजिक घटना या समस्या के विषय में व्यक्तिओं की राय और मनोवृत्तियों को मापने के यंत्र हैं। पैमाने गुणात्मक तथ्यों को गणनात्मक तथ्यों में परिवर्तित करने की प्रविधियां है  और क्रम का निर्धारण करने में इनका विशेष महत्व है। अतः पैमाना किसी घटना अथवा वस्तु को मापने का एक यंत्र है। अध्ययन वस्तु की प्रकृति के अनुसार ही पैमानों का निर्माण किया जाता है। जिस प्रकार प्राकृतिक विज्ञानों में विभिन्न वस्तुओं को मापने के यंत्र भिन्न- भिन्न होते हैं उसी प्रकार सामाजिक घटना की विशिष्ट प्रकृति को ध्यान में रखते हुए उसी के अनुसार पैमानों का निर्माण किया जाता है ।
परिभाषा-
 गुडे तथा हॉट के मुताबिक- अनुमापन प्रविधियों में अन्तर्निहित समस्या इकाइयों की श्रेणियों को एक क्रम के अन्तर्गत व्यवस्थित करने की है। दूसरे शब्दों में अनुमापन प्रविधियां गुणात्मक तथ्यों की श्रेणियों को गुणात्मक श्रेणियों में बदलने की पद्धतियां है।
पी वी यंग के अनुसार- किसी वस्तु या घटना की मात्रा या भार को मापने के लिए जिस पैमाने का प्रयोग किया जाता है, उसके आधार पर जिन अनुमापन साधनों का निर्माण किया जाता है, उसे अनुमापन प्रविधि कहते है।
डॉ आर एन मुकर्जी - अनुमापन का तात्र्पय पैमाइश की उस विधि से है जिसके द्वारा गुणात्मक तथा अमूर्त सामाजिक तथ्यों या घटनाओं को गणनात्मक स्वरूप दिया जाता है।
पैमाना पध्दतियों के प्रकार -
गुणात्मक मीडिया शोध में क्रमाबद्धता, तार्किकता और वैज्ञानिकता लाने के लिए पैमाने के प्रयोग को अधिक महत्वपूर्ण समझा जा रहा है। श्रीमती यंग के अनुसार दो प्रकार के मानवीय व्यवहार के माप के लिए विभिन्न यंत्रों का निर्माण हुआ है।
1  मनुष्य के संचार तथा व्यक्तिगत को मापने वाले पैमाने जिनके द्वारा प्रवृत्तियां, नजरिया, नैतिकता, चरित्र और सहयोग आदि की माप ली जाती है।
2  संचार संस्कृति और सामाजिक पर्यावरण को मापने वाले पैमाने जिनके द्वारा संस्थाओं, संस्थागत व्यवहार,संचारिक तथा सामाजिक स्थिति, आवास व्यवस्था, रहन सहन आदि की माप ली जाती है।
मीडिया या संचार के क्षेत्र में प्रमुख पैमाने निम्नलिखित है। -
1 अंक पैमाना- इस पैमाने में कुछ शब्द लिख दिए जाते हैं प्रत्येक शब्द का एक अंक होता है। सूचनादाता जिन शब्दोे को प्रसन्नता देने वाला समझता है उसके आगे सही का चिन्ह लगा देता हैं । जितने सही के निशान होते है, उनकी गिनती कर ली जाती है। इस प्रकार कुल योग ही प्राप्ताक होते है। इन अंको के आधार व्यक्ति के मनोभावों और प्रवृत्तियों का पता लग जाता है।
2 संचार रिक्तता मापन यंत्र - इस तरह के पैमानों द्वारा भिन्न भिन्न वर्गों अथवा व्यक्तिओं के मध्य पाए जाने वाले संचार रिक्तता का पता चल जाता है इस प्रकार के दो पैमाने प्रचलित है।
1 बोगार्डस का पैमाना
2 मीडियामितीय पैमाना
3 तीव्रता मापक यंत्र- व्यक्तिओं की रूचियों, अभिरूचियों, प्रवृत्तियों, मनावृत्तियों, मनाभावों आदि की तीव्रता और गहनता को मापने के लिए इन पैमानों का प्रयोग किया जाता है।
4 पदसूचक पैमाने - भिन्न- भिन्न पदों को तुलनाक्रम में रखकर जो अनुमापन पैमाना बनाया जाता है उसे की पदसूचक पैमाना कहते है। इन पैमाने  को निम्नलिखित प्रणालियों द्वारा निर्मित किया जाता है।
युग्म तुलना
हॉरोविज प्रणाली
थर्सटन प्रणाली
आंतरिक स्थिरता मापक पैमाने
मीडिया निर्देशांक
मनोवृत्तियों के माप की प्रणालियां
मीडिया संचार या समाज से जुड़े व्यक्ति अथवा समूह की मनावृत्ति दो प्रकार से मापी जा सकती है।
1 अभिमत सर्वेक्षण- व्यक्ति अथवा समूह की मनावृत्तियों के संदर्भ में उपयुक्त पैमाने द्वारा माप की सुविधा न होने के कारण प्रायः उनकी मौखिक राय के द्वारा ही उनकी प्रवृत्तियों का अनुमान किया जाता है। जब तक वास्तविक घटना न घटित हो तब तक शारीरिक व्यवहार संभव नही होता है और उसके बिना अनुमापन भी संभव नहीं होता । अतः यह कहा जा सकता है, कि व्यक्ति अथवा समूह की मनोवृत्ति का अनुमान उनके द्वारा मतानुसार ही किया जाएगा।
2 अनुमापन प्रणाली - व्यक्ति या समूह की मनावृत्ति उनके व्यवहार से परिलक्षित होती है। शरीर की भाषा से ही व्यक्ति की वास्तविक मनोवृत्ति की अभिव्यक्ति होती है। वास्तविक व्यवहार को मापने से ही मनावृत्ति का वास्तविक परिचय प्राप्त हो सकता है। मौखिक संचार के द्वारा व्यक्ति प्रायः अपने वास्तविक स्वरूप को प्रकट नहीं करता । अतः शरीर भाषा की माप ही मनोवृत्ति को समझने की सर्वश्रेष्ठ प्रणाली है।
1 अंक पैमाना - मीडिया या संचार शोध के लिए इसे सर्वाधिक सरल पैमाना माना जाता है। इसके माध्यम से व्यक्ति और समूह के व्यवहार का अनुमापन बहुत हद तक संभव है। वास्तव में अंक पैमाना के तहत मीडिया या संचार से संबंधित किसी भी विषय पर व्यक्ति और समूह की मनोवृत्ति जानने के लिए कुछ शब्द या स्थितियां लिख दी जाती है। इनमें से कुछ शब्द विषय का विरोध प्रकट करने वाले होते है। तथा कुछ उसके समर्थन का आभास देते है। उत्तरदाता जिन शब्दो को पसंद करता है उसके सामने सही और नापसंद वाले शब्दों को वहां से हटा देता है। हर सहमति के चिन्ह को 1 अंक दिया जाता है। इस प्रकार विषय के प्रति व्यक्ति की मनोवृत्ति की सीमा का अनुमान प्राप्तांको  के आधार पर किया जाता है। कभी- कभी परस्पर विरोधी तथा परस्पर सहमतिपूर्ण साथ साथ रखें जाते है। ऐसा इसलिए ताकि एक ही समय दोनो का उचित भार समझकर सूचनादाता मत प्रकट कर सके।
2 तीव्रता मापक पैमाना- यह पैमाना मनोवृत्ति मापने की एक अत्यत ही महत्वपूर्ण अनुमापन प्रणाली है। अर्थात इन पैमानों का उपयोग रूचियों और मान्यताओं की गहनता को मापने के लिए किया जाता है। व्यक्ति विषय के प्रति पूर्ण सहमत, थोड़ा बहुत सहमत, कम सहमत या असहमत हो सकता हैं। वह उदासीन और तटस्थ भी हो सकता है। व्यक्ति की मनोवृत्ति जानने के लिए यह महत्वपूर्ण है कि इन सभी सीमाओं का ज्ञान प्राप्त किया जाए। इसे अलग अलग शब्दों के द्वारा व्यक्त किया जा सकता है। यह तीव्रता जितने शब्दों से प्रकट की जाती है। उतने ही खंड पैमाने बन जाते हैं। यहां पांच खंडो के पैमाने का उदाहरण किया जा रहा है।
1 पूर्णतः पंसद 2 पसंद 3 अनिश्चित 4 नापसंद 5 पूर्णतः नापसंद ।
यहां तीव्रता मापने के लिए सात खंडों के भी पैमाने बनाए जा सकते हैं इस पैमाने के मध्य की स्थिति को शून्य का भार प्रदान किया जाता है। इसके दोनो ओर 1 2 3 आदि शब्दों का प्रयोग होता है। ये अंक धन अथवा ऋण में प्रदान किए जाते है। तीव्रता मापक पैमाने दो प्रकार के होते है। एक सम विस्तार और एक असम विस्तार पैमाना। उपरोक्त पांच खंडों वाला पैमाना समय विस्तार पैमाना है क्योंकि इसमें भिन्न भिन्न खंडों का विस्तार समान है तथा तटस्थ बिंदु का अंक शून्य है । असमान विस्तार वाले पैमाने में भार एक क्रमानुसार होता है, जिसमें माप शून्य से आरंभ होकर आगे बढ़ती जाती है। यहा कोई जरूरी नहीं कि दोनों खंडों के बीच का विस्तार समान हो । इन दोनेां प्रकार के पैमानों को दो विद्वानों ने अलग अलग तरीके से वर्णित किया है।
1 थर्सटन का समय विस्तार पैमाना-
 यह पैमाना सबसे पहले एल एल थर्सटन द्वारा किसी समूह की राय जानने के लिए किया गया था। यह पैमाना आवृत्ति बंटन के रूप में होता है। इसकी आधार रेखा प्रवृत्तियो के पूर्ण विस्तार को समान खंडों में प्रकट करती है। सम विस्तार प्रणाली में इसके एक छोर पर धनात्मक अधिकतम भार बिंदु रहता है। जबकि दूसरे छोर पर ऋणात्मक अधिकतम भार बिंदु रहता है। यहां शून्य भार मध्य बिंदु पर रहता है।
2 लाइकर्ट का पैमाना
यह पैमाना भी थर्सटन के पैमाने की तरह ही है, किन्तु उससे अधिक सरल और सुबोध है। लाइकर्ट के तीव्रता मापक पैमाने को तीव्रताओं के योग का पैमाना भी कहा जाता है।
इस प्रणाली में अंक प्रदान करने की एक अन्य विधि को लगाया जाता है जिसे सिगमा विधि कहा जाता है। इसका उपयोग एक गणितीय तालिका के माध्यम से किया जाता है। भिन्न भिन्न विवरणों को अनेक प्रकार के व्यक्तिाओं में बांटकर उनमें पांच खंडों में से किसी एक खंड पर निशान लगाने को कहा जाता है। बाद में हर एक खंड का योग प्रतिशत में निकाल लिया जाता है। हर प्रतिशत का सिगमा मूल्य भी निकाल लिया जाता है।
पदसूचक पैमाना- यह अनुमापन प्रणाली का एक अपरिहार्य पैमाना है। यह तीव्रता मापन पैमाने के सदृश्य होता है। इसमें किसी विशेष तत्व का सभी क्रमों में स्थान निर्धारित किया जाता है। इस पैमाने के जो दो प्रमुख पैमाने है वे इस प्रकार है।
1 तुलनात्मक युग्म - इस विधि के अन्तर्गत व्यवसायों के जोड़े लिखकर सूचनादाता को दिए जाते है। हर जोड़े में से एक पर सहमति का निशान लगवाया जाता है। प्रत्येक व्यवसाय को मिले अंको या प्राथमिकताओं का योग निकाल लिया जाता है। इन सभी के माध्य को पैमाने का मूल्य समझा जाता है।
3 हॉरोविज प्रणाली - हॉरोविज ने जातीय पक्षपात का अध्ययन करने के लिए 12 चित्रों का चयन किया। इसमें से 8 नीग्रो और 4 गोरे बच्चों के थे। ये चित्र स्कूली बच्चों को दिये गये । इन बच्चों को चित्रों को प्राथमिकता के आधार पर उपर से नीचे क्रमानुसार लगाने को कहा गया । उपर से नीचे चित्रों को क्रम से 1 2 3 4 5 आदि अंक दिए गए । हॉरोविज ने इन स्कूली बच्चों में बालकों को भिन्न भिन्न स्थितियों में उन्ही चित्रों में से साथी चुनने का कहा। इस प्रकार प्राथमिकता के प्रतिशत के आधार पर पक्ष या विपक्ष का फैसला लिया गया ।
4 संचार रिक्तता माप पैमाना- इर समाज या समुदाय में  संचार रिक्तता के कारण वर्ग विद्वेष की भावना किसी न किसी रूप में पाई जाती है। प्रायः व्यक्ति अतीत के अनुभवों और आस पास के पर्यावरण से प्रभावित होकर किसी वर्ग के प्रति सकारात्मक नजरिया रखता है। दोनो वर्गो के प्रति द्वेष और निकटता की भावना भी अलग अलग मात्रा में होती है। इस प्रकार की संचार रिक्तता को मापने के लिए संचार रिक्तता पैमाना या सामाजिक दूरी पैमाना का प्रयोग किया जाता है। संचार रिक्तता या सामाजिक दूरी मापने के लिए निम्नलिखित दो प्रकार के पैमाने अधिक प्रचलित है।
1 बोगार्डस का पैमाना- बोगार्डस ने संचार रिक्तता या सामाजिक दूरी को इंगित करने वाले भिन्न- भिन्न संबंधों को चयन किया । इन सभी संबंधों को सात ऐसी श्रेणियों में विभाजित किया गया जो बढ़ती हुई संचार रिक्तता या समाजिक दूरी प्रकट करती थी। यह काम सौ जजों से कराया गया। बाद में ये अनुसूचियों 1725 व्यक्तिओं को दी गयीं। इनमें दक्षिण की ओर प्रजातियों  के नाम लिखे गये। उत्तर की ओर संबंधों या दूरियों की श्रेणियां रखी गई । जैसे व्यवसाय साथी, जीवन साथी, क्लब, साथी आदि बनाने की स्वीकृति। इन सभी व्यक्तिओं को श्रेणियों के सामने चिन्ह लगाने का निर्देश दिया गया । हर श्रेणी के आधार पर प्रजातियों के प्रति मनोवृत्तियों का योग निकालकर प्रतिशत में परिवर्तित किया गया। इस प्रकार भिन्न भिन्न के प्रति संचार रिक्तता या सामाजिक दूरी का औसत निकाला गया । लेकिन इस विधि को कम विश्वसनीय समझा जाता है।
मीडियामितीय पैमाना- इस विधि का प्रयोग भी प्रत्यक्ष- परोक्ष रूप से किया जाने लगा है। यह पैमाना संस्थागत अथवा सामुदायिक अथवा सामूहिक मनोवृत्तियों को मापने में उपयोग किया जाता है। समूह में पारस्परिक संचार एवं संबंधों की माप में यह पैमाना अधिक प्रासंगिक, लाभकारी, उपयोगी और सहायक साबित होता है।
मीडिया या संचार शोध में सामुदायिक, संस्थागत व्यवहार का निम्न लिखित प्रणालियों द्वारा मापा जा सकता है।
1 मीडियामितीय पैमाना - इस प्रणाली की निम्न लिखित विशेषता होती है।
अ मीडियामितीय एक अनुमापन विधि है, जिसके द्वारा सामूहिक या सामुदायिक स्वीकृति अथवा अस्वीकृति प्रेम अथवा घृणा की सीमा माप ली जाती है।
ब  यह सामुदायिक, संस्थागत, या सामूहिक संबंधों, मीडियाई या संचारिक संरचना तथा स्थिति के अध्ययन से संबंधित है।
स इसके द्वारा सामुदायिक,संस्थागत, सामाजिक तथा समूह सांचारिक व्यवहार की प्रस्तुति रेखाचित्रों अथवा सरल बिंदु रेखाओं द्वारा की जाती है।
इस पैमाने के निर्माण में संस्था का चुनाव माप के पहलू संबंधित तथ्यों का चुनाव एवं भार प्रदानीकरण आदि जैसी महत्वपूर्ण प्रक्रियाओं का अपनाया जाता है। एक अच्छी मीडियामितीय पैमाने में विश्वसनीयता, वैधता, सरलता, व्यापकता, व्यावहारिकता, आदर्शानुकूलता, और उचित भार की मौजुदगी रहती है।
2 मीडिया की बिंदु रेखीय विधि- मीडिया का बिंदु रेखीय या ग्राफ द्वारा चित्रण पारस्परिक आकर्षण अथवा विकर्षण को प्रकट करने का सरल मीडियामितीय साधन है।
3 मीडिया निर्देशांक- जब मीडिया या संचार से संबंधित एक से अधिक सम्मिलित तथ्यों का तुलनात्मक अध्ययन करना होता है, तो मीडिया निर्देशांको का प्रयोग किया जाता है। सांचरिक अथवा संस्थागत व्यवहार को मापने के लिए मीडियामितीय पैमानों का अधिक परिमार्जित और परिष्कृत रूप निर्देशांक है। इसके द्वारा मीडिया या संचार से संबंधित तथ्यों की माप की इकाई में की जा सकती है तथा एक ही दृष्टि में उनके बारे में जानकारी हासिल की जा सकती है।
अनिल अत्री ........

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