Wednesday, July 23, 2014

नरेला विधानसभा में बदहाल खेल परिसर ... विधायक साहब ने माँगा स्टेडियम ..

नरेला विधानसभा में बदहाल खेल परिसर ... विधायक साहब ने माँगा स्टेडियम .ANIL ATTRI DELHI..
एंकर - बाहरी दिल्ली के नरेला विधानसभा में पन्द्रह साल पहले बनने शुरू हुए खेल परिसर आज भी पूरी तरह नहीं बन पाए ..उस वक्त जो पैसा इन परिसरों पर लगा आज वो पैसा भी बर्बाद नजर आ रहा है .. पन्द्रह साल से सिर्फ चारदीवारी ही इन परिसरों की बनी .. एक परिसर में दो से तीन कमरे बने तो आज उन कमरों की खिड़की दरवाजे बिजली की तारे सब गायब है और ये परिसर नशेबाजो के ठिकाने बन चुके है .. परिसर में बड़ी बड़ी घास है खेल की कोई सुविधा नही .. न ही कोई कोच या ट्रेनर ... इलाके में में कई राष्ट्रिय व् अंतरराष्ट्रीय पहलवान है .. अब यहा के पहलवानों की शिकायत है की उन्हें यहाँ कच्ची धरती पर रेत पर खेलना पड़ता है .. रेत पर दौड़ लगानी पडती है पर जब वे कम्पीटिशन में जाते है तो उन्हें वहा मेट पर कुश्ती आदि लडनी पडती है ..सिंथेटीक ट्रेक पर दौड़ना पड़ता है और यहाँ अभ्यास रेट का होता है और इस कारण वे गोल्ड लाने में कई बार चुक जाते है ..  अब नरेला के विधायक ने कहा की वे इस मुद्दे को उठाए हुए है और अधिकारियों से लेकर उपराज्यपाल से भी मुलाक़ात की .. साथ ही नरेला में करीब सौ बीघे के तालाब को स्टेडियम बनाने की मांग को लेकर कोशिश में जुटे है ..कांग्रेस ने पन्द्रह साल में इनकी कोई संभाल नहीं की न काम किया लोगो को अब  भाजपा के नए विधायक व् सांसद से आश जगी है ..

वी ओ 1 नरेला विधानसभा में दो खेल परिसर है पहला नरेला सबसिटी में तो दूसरा बाकनेर गाव में और दोनों ही बदहाल है .. ये है नरेला विधानसभा के बाकनेर गाव का खेल परिसर ..खेल परिसर का काम पन्द्रह साल पहले शुरू हुआ था ... उस वक्त परिसर की चारदीवारी बनी और ये दो कमरे भी बने .. लेकिन लगातार पन्द्रह साल बीत गये किसी भी सरकार या अधिकारियों ने इसे नहीं संभाला ..यहा बिल्डिंग जर्जर हो गई .. लोग कमरों के दरवाजे उतार ले गये ..बिजली पंखे उखाड़ ले गये ..खिडकियों की लोहे की ग्रील तक चोर उखाड़ कर  ले गये ..शराबियो व् नशेड़ियो को एक अच्छा अड्डा मिल गया ..अब यहाँ खिलाड़ी प्रेक्टिस नहीं बल्कि नशेडी निवास करते है .. बड़ी बड़ी घास बदहाली सामने है .. बोर्ड के नाम तक मिट गये ... अब लोग इन स्टेडियम की बर्बादी पर नाराज है . यह इस एरिया में कई नैशनल व इंटरनैशनल खिलाड़ी है ... इन खिलाडियों को भी इन खेल परिसरों की बदहाली की शिकायत है .. इनका कहना है की हमारे बच्चो को सुविधाए दी जाए तो गोल्ड और ज्यादा आयेगे .. यहाँ हमारे बच्चे कच्ची जमीन पर दौड़ लगाते है कुश्ती जैसे दुसरे गेम्स खेलते है और जब ये बच्चे कम्पीटीशन में लाते है तो वहा मेट पर गेम्स होते है ..और सिंथेटिक ट्रेक पर दौड़ना पड़ता है पर यहाँ अभ्यास रेत का होता है इस कारण हमारे काफी बच्चे पिछड़ जाते है .. कांग्रेस ने पन्द्रह साल में इनकी कोई संभाल नहीं की न काम किया लोगो को अब नई  भाजपा सरकार से आश जगी है ..
बाईट - जितेद्र खत्री ( स्थानीय निवासी पूर्व खिलाड़ी )
वी ओ 2
ये दूसरा स्टेडियम है नरेला सबसिटी में ...यहाँ बोर्ड तो लगा है पर बाहर बोर्ड ही लगा अंदर सुविधाए नहीं .. कोई कोच ट्रेनर कुछ नहीं ..कुछ बच्चे खाली ग्राउंड देख यहाँ क्रिकेट खेलने जरुर आ जाते है पर बच्चो को भी शिकायत है की इन्हें ट्रेनिंग लेने दूर बसों में किराया देकर बाहर जाना पड़ता है और गरीब परिवारों के बच्चे जा नहि नहीं पाते और प्रतिभाये दबकर रह जाती है ....इस खेल परिसर में भी कोई सुविधा नाम की चीज नहीं ..
बाईट -  सुनील कुमार   ( खेलने वाला बच्चा )
बाईट  - मोनू
( खेलने वाला बच्चा )वी ओ 3
इस बारे में भाजपा से चुनकर आये स्थानीय विधायक नीलदमन खत्री से बात की गई वे खुद इन समस्याओ को मानते है और कहना है की वे खुद अधिकारियों से इस मुद्दे पर मीटिंग कर चुके है और इन परिसरों के लिए लगे है .. बल्कि साथ ही विधायक साहब का कहना है की वे इन खेल परिसरों के उद्धार के सतह साथ एक स्टेडियम भी अपनी विधानसभा में मांग रहे है ..इनके पास सौ बीघे का एक तालाब है वहा विधयाक साहब एरिया के लोगो के लिए स्टेडियम मांग रहे है और इस मसले पर उपराज्यपाल से भी मुलाक़ात कर चुके है ..साथ ही विधायक साहब ने खुद प्रधानमंत्री साहब को भी लिखा है और केन्द्रीय वित् मंत्री  अरुण जेटली से भी स्टेडियम के लिए बजट की मांग कर रहे है ...
बाईट - नीलदमन खत्री ( भाजपा विधायक नरेला )
वी ओ 4
अब नरेला विधानसभा के लोगो को खेल के मामले में भाजपा की नई टीम से काफी आशाये है और यहाँ के विधायक व संसद इस मामले में कुछ कम करते भी नजर आ रहे है ... अब देखने वाले बात होगी की नरेला के लोगो को खेलो के मामले में क्या मिल पाता है ..................
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अनिल अत्री दिल्ली ........................

अनिल अत्री  दिल्ली ...
ANIL ATTRI DELHI ......

Sunday, July 20, 2014

दिल्ली के संबसे महेंगे नरेला लामपुर अंडरपास की पोल पूरा बनने से पहले ही खुली..

दिल्ली के संबसे महेंगे नरेला लामपुर अंडरपास की पोल पूरा बनने से पहले ही खुली..

अनिल अत्री ..

एंकर - दिल्ली के संबसे महेंगे नरेला लामपुर अंडरपास की पोल पूरा बनने से पहले ही खुली .. इलाके में रेलवे फाटक के कारण भारी जाम रहता था और जब अंडरपास की बात आई तो सभी लोग खुश थे क्योकि करीब पैतीस करोड़ की लागत से दिल्ली का सबसे महेंगा अंडरपास यहाँ बनने जा रहा था .. दिल्ली नगर निगम ने 2009 में इस अंडरपास का शिलान्यास किया जो अठारह महीने में बनकर तैयार होना था .. लेकिन आज भी करीब चालीस प्रतिशत कम बाकी है और जो काम हुआ है उसकी क्वालिटी पर अभी से उठे सवाल ...  अंडरपास में भरता है काफी  पानी .. साथ ही बारिस में करंट आने पर सभी स्ट्रीट लाइट्स भी बंद करनी पडती है .. अंडरपास नीचे से टूटना शुरू हो गया और सरिये रोड से बाहर आ गये है .. बारीस में छत से पानी भी टपकने लगता है .. RTI से सामने आया की जो महेंगी लाइट्स लगनी थी उनकी जगह छोटी छोटी सस्ती लाइट्स लगा दी .. अंडरपास में लिफ्ट तक का टेंडर हुआ था पर सीढिया तक पूरी नहीं बन  पाई ..बारीस के वक्त अंडरपास में इतना पानी भरता है की DTC की बसे भी नहीं निकल पाती बड़ी गाडियों की तो बात दूर .. अब इलाके के कई संगठन इस समस्या व् पैसे के दुरूपयोग को लेकर अंडरपास पर धरने की चेतावनी दे रहे है ..इस मुद्दे पर नरेला के भाजपा विधायक नीलदमन खत्री ने कहा की कुछ काम बाकी है जो टेंडर में लिखा है वो काम करने होंगे ..अधिकारियो से दो दिन पहले ही हुई मीटिंग और क्वालिटी में कमी मिली तो करवाई जायेगी कानूनी कारवाई ...

वी ओ 1 ये दिल्ली का नरेला लामपुर रोड ... और इसी रोड पर ये अंडरपास बना है .. दिल्ली नगर निगम द्वारा अंडरपास का निर्माण 2009 में शुरू हुआ ..अठारह महीने समय सीमा थी लेकिन अभी तक भी ये पूरा नही हो पाया ... और पैसे के हिसाब से ये दिल्ली का सबसे महेंगा अंडरपास है ..उस वक्त पैतीस करोड़ रूपये इसके मंजूर हुए उसके बाद इसका बजट कई करोड़ रूपये और बढाया गया .. अब दिल्ली का सबसे महेंगा अंडरपास  बनना था तो इलाके के लोगो ने काफी सपने देखे थे .. अब इस अंडरपास पर अभी से सवाल उठने शुरू हो चुके है ... फेडरेशन ऑफ़ नरेला ने अंडरपास के निर्माण के कम पर कई सवाल खड़े किये है .. फेडरेशन का आरोप है की अंडरपास के निर्माण में बड़ा घोटाला हुआ है जिसकी जांच होनी चाहिए ...
...  अंडरपास में काफी पानी भरता है और इस बात को लेकर जब अधिकारियों से बात की तो कहा की पानी निकासी की मोटर चोरी हो गई .. इस पर फेडरेशन के लोगो ने अधिकारियों से FIR की कोपी मांगी तो नहीं दिखा पाए इससे साफ था की वहा मोटर लगाईं ही नहीं गई ..... साथ ही बारिस में करंट आने पर सभी स्ट्रीट लाइट्स भी बंद करनी पडती है .. अंडरपास नीचे से टूटना शुरू हो गया और सरिये रोड से बाहर आ गये है .. बारीस में छत से पानी भी टपकने लगता है .. RTI से सामने आया की जो महेंगी लाइट्स लगनी थी उनकी जगह छोटी छोटी सस्ती लाइट्स लगा दी .. अंडरपास में लिफ्ट तक का टेंडर हुआ था पर सीढिया तक पूरी नहीं बन  पाई ..बारीस के वक्त अंडरपास में इतना पानी भरता है की DTC की बसे भी नहीं निकल पाती बड़ी गाडियों की तो बात दूर की बात .....
बाईट - जोगिद्र दहिया ( अध्यक्ष फेडरेशन ऑफ़ नरेला )
बाईट - सुखबीर सिंह     ( स्थानीय निवासी )
बाईट -  संजय प्रसाद    ( स्थानीय निवासी )

वी ओ 2 इस बारे में नरेला से भाजपा के विधायक नीलदमन खत्री से बात की गई तो इनका कहना है की अंडरपास का  काम पांच से दस प्रतिशत बाकी है .. स्टेंडिंग कमेटी ने भी दो दिन पहले ही इस मुद्दे पर अधिकारियों की मीटिंग ली है और हम भी अधिकारियो से मिले जल्दी से जल्दी इसका कम पूरा हो और यदि क्वालिटी में कमी की शिकायत सही मिली तो दोषी अधिकारियों के खिलाफ
कानूनी कारवाई करवाई जायेगी ...
बाईट - नीलदमन खत्री ( भाजपा विधायक नरेला )
वी ओ 3
अब जनता को इस अंडरपास से जमा से जरुर काफी राहत मिली है पर लोग इस पर लगे पैसे के हिसाब से काम में अच्छी क्वालिटी चाहते है ताकि अंडरपास के कारण लोग हादसों के शिकार न हो ........................

अनिल अत्री Delhi ...........................

 

दिल्ली में भूमिगत पानी का गिरता जल स्तर ..बचाने में जुटे कुछ लोग ....

दिल्ली में भूमिगत पानी का गिरता जल स्तर ..बचाने में जुटे कुछ लोग .............
अनिल अत्री दिल्ली ..

एंकर - देश की राजधानी कंक्रीट में तबदील  हो गई

... बारीस का पानी जमीन में नहीं जा पा रहा है ..जब भी बारीस होती है पानी बहकर बेकार चला जाता है या सुख जाता है .और जमीनी पानी ट्युबल व् हेंड पम्प खिंच रहे है ..वाटर लेवल लगातार घट रहा है ... .इस घटते पानी के लेवल  को बचाने की मुहीम बाहरी दिल्ली के कुछ लोगो ने शुरू की है .. साथ ही सरकारी कानून तो पहले से है पर लोगो को उसकी जानकारी तक नहीं है .. घरो का बारीस का पानी नीचे जमीन में जाए इसके लिए रेन वॉटर हार्वेस्टिंग का पालन नरेला के कुछ लोग कर रहे है और इन्होने अपने घरो में बोर कर पानी को वापिस जमीन में डाला है ..और अब ये लोग दुसरो को भी प्रेरित कर रहे है .. अब फेडरेशन ऑफ़  नरेला ने लोगो के बीच जाकर ये बात समझानी शुरू कर दी है और लोगो को पसंद भी आ रही है और लोगो ने अपने घरो में बारीस का पानी बोर के माध्यम से दुबारा जमींन में डालने के लिए बोर करवाकर उसमे छतो के पानी का कनेक्शन करवा दिया है ..अब जरूरत है इसे दिल्ली ही नहीं पूरे भारत में कानून लागू किया जाए ये समस्या अकेली दिल्ली की नहीं बल्कि पूरे देश का यही हाल है ...  News चैनल  की पानी बचाने की इस मुहीम में नरेला से भाजपा विधायक नीलदमन खत्री ने News चैनल के माध्यम से अपनी जनता से अपील की है की लोग अपने घरो में रेन वाटर हार्वेस्टिंग सिस्टम जरुर लगवाये ... अब नरेला विधायक ने भी SMS , सोसल साइट्स , पत्राचार जैसे सभी माध्यमो से वाटर हार्वेस्टिंग के प्रचार का बीड़ा उठा लिया है और विधायक साहब का कहना है की अब इस पर इतना काम करेगे की नरेला का वाटर लेवल दिल्ली में सबसे पहले उपर लाकर दिखायेगे ..

वी ओ 1 देश की राजधानी पानी की किल्लत से जूझ रही है और लगातार जूझती रही है  .. राजधानी का वाटर लेवल लगातार नीचे गिर रहा है .. ऐसे में आने वाले वक्त के लिए पानी की समस्या से बचने के लिए इस घटते लेवल को काबू पाना जरुरी है ... सबसे जरुर्री है की लोग भी इसमें सहयोग दे .सरकार भी श्ख्ती से नियमो का पालन करवाए .. दिल्ली में सरकार की तरफ से रेन वॉटर हार्वेस्टिंग सिस्टम जरुरी है .. यदि आप 200 गज के दायरे में आप अपना मकान बनाते है तो रेन वॉटर हार्वेस्टिंग सिस्टम जरुरी है .. जब बारीस होती उसका पानी नालियों गलियों में जाकर वाष्प बन जाता है .. पानी का सदुपयोग नहीं हो पाता .. दूसरी तरफ जमीन का पानी लगातार टयुबल व् हेंडपम्प खिंच रहे है ..जिससे जल स्तर नीचे जा रहा है ..रेन वॉटर हार्वेस्टिंग सिस्टम में घर की छतो व् घर में गिरने वाला बारीस का पानी बाहर नालियों में न जाकर जमीन में किये गए बोर ( सुराख ) में जाता है और पानी बेकार की बजाय जमीन में चला जाता है जिससे वाटर लेवल ज्यादा नीचे जाने में बचाव रहते है .. यदि सभी लोग अपने घरो में रेन वॉटर हार्वेस्टिंग सिस्टम लगाये और बारीस का पानी बेकार न बहकर जमीन में चला जाए तो पूरी दिल्ली का वाटर लेवल उपर आ जाये और पानी की समस्या का समाधान हो सकता है ... बाहरी दिल्ली के नरेला में भी वाटर लेवल लगातार नीचे जा रहा है यहाँ फेडरेशन ऑफ़ नरेला ने इस लेवल को बचाने की मुहीम शुरू की है और लोगो को इस बारे में जागरूक कर रहे है ..  फेडरेशन के कुछ लोगो ने पहले अपने घरो में इसकी शुरुआत की है ...
बाईट - जोगिन्द्र दहिया ( अध्यक्ष फेडरेशन ऑफ़ नरेला )
वी ओ 2
अब फेडरेशन के प्रचार के असर भी हो रहा है ..लोगो को इस बारे में जानकारी का अभाव है यदि सभी को जानकारी दी जाए काफी लोग ख़ुशी ख़ुशी ये बोर करवाना चाहते है ..क्योकि इसमें लागत भी ज्यादा नहीं .. एक से दो हजार रूपये में ये बोर हो जाता है और इस बोर में घर की छतो का पूरा पानी नीचे जमीन में चला जाता है .. और फेडरेशन का मानना है की यदि सरकार नए निर्माण का रहे लोगो को कुछ लोंन या सब्सिडी दे तो और अच्छा हो जिससे गरीब लोग भी रेन वॉटर हार्वेस्टिंग कर पाए ..
बाईट - जोगिन्द्र दहिया ( अध्यक्ष फेडरेशन ऑफ़ नरेला )
वी ओ 3
अब जब फेडरेशन ने लोगो को जानकारी दी और ये एक मात्र शुरुआत है लेकिन इस शुरुआत के नतीजे पोजिटिव मिल रहे है ... और यदि फेडरेशन बीस लोगो से अपील  करती है तो उनमे से एक तो सहमत हो ही जाता है ..
बाईट - राजू ( फेडरेशन से प्रेरणा लेकर रेन वॉटर हार्वेस्टिंग करने वाला शख्स  टेक्स्ट - बाईट पंजाबी में है ..)

वी ओ 4 अब ये दुसरे संगठन ही नहीं बल्कि नरेला से भाजपा विधायक नीलदमन खत्री भी वाटर हार्वेस्टिंग सिस्टम के लिए जनता के बीच आये है और नरेला का गिरता जल स्तर बचाने का दावा किया है .. साथ ही News चैनल  द्वारा पानी बचाने के इस मुद्दे का समर्थन करते हुए चैनल के माध्यम से भी भाजपा विधायक नीलदमन खत्री ने अपील की है की लोग अपने घरो में वाटर हार्वेस्टिंग सिस्टम जरुर लगवाये .. इसके साथ साथ विधायक साहब ने SMS , सोसल साइट्स , पत्राचार जैसे सभी माध्यमो से वाटर हार्वेस्टिंग के प्रचार का बीड़ा उठा लिया है और विधायक साहब का कहना है की अब इस पर इतना काम करेगे की नरेला का वाटर लेवल दिल्ली में सबसे पहले उपर लाकर दिखायेगे ..

बाईट - नीलदमन खत्री (भाजपा विधायक नरेला )

वी ओ 5
अब कुछ लोगो की ये अच्छी मुहीम है और इसे बड़े स्तर पर ले जाना हम सबकी जिम्मेदारी है क्योकि जल ही जीवन है ..बिना जल जीवन संभव नहीं ..जरूरत है सरकार भी इसका प्रचार प्रसार करे और इसको कानून शखती से लागू किया जाए ...  और हम भी आपसे अपील करता है की भू-जल को बचाने के लिए रेन वॉटर हार्वेस्टिंग का पालन जरुर करे ........................

अनिल अत्री दिल्ली ................................

Saturday, February 15, 2014

पंजाबी फिल्म इश्क ब्रांडी के कलाकारो ने किया डांस ..

पंजाबी फिल्म इश्क ब्रांडी के कलाकारो ने किया डांस ..
अनिल अत्री ..
एंकर - पंजाबी फिल्म इश्क ब्रांडी के कलाकारो ने किया बच्चो के साथ डांस ..इस फिल्म के कलाकार दिल्ली में रोहिणी के एक निजी संस्थान में फिल्म के प्रोमो के लिए आये .. कलाकरों ने स्कूल कॉलेज के बच्चो के साथ जमकर डांस किया .. बच्चे भी जमकर थिरके ..पूरा पंडाल झूम उठा ... फिल्म की शूटिंग भारत और मोरिसिश में हुई है ..कलाकारो को फिल्म से बड़ी आशा है ..फिल्म में गीतकार अल्फाज , रोशन प्रिंस , फिल्म की हिरोईन वामिका गप्पी है .. ये कलाकार दिल्ली में फिल्म को प्रमोट करने पहुंचे ..
वी ओ 1 रोहिणी के एक निजी संस्थान में झूम रहे ये कलाकर है 21 फरवरी को रिलीज होने वाले इश्क ब्रांडी पंजाबी फिल्म के .. ये जमकर इस मंच पर थिरके .. अल्फाज के सतह पूरा पंडाल नाच उठा ... कोलिज के लड़के लडकिया जमकर इन गानों पर नाचे ..( गाने व डांस के विसुअल यूज करे ..) पंजाबी कलाकारों ने सभी को झुमने पर मजबूर कर दिया .. साथ में फिल्म के डायरेक्टर , हीरो , हिरोइन सब मंच पर आये है ... हिरोइन वामिका गप्पी ने भी दिल्ली में अपनी फिल्म को प्रमोट करने के लिए डांस किया .........( गानों के विसुअल है .....)
इस फिल्म में हिरोइन की शादी जब हीरो से तय हुई तो उसे तुड़वाने के लिए फिल्म के खलनायक मोरिसिश तक पहुंच गए ..
बाईट - वामिका गप्पी ( हिरोइन फिल्म इश्क ब्रांडी )
वी ओ 2 फिल्म के हीरो डायरेक्टर व दुसरे कलाकारो को इस फिल्म से बड़ी आशा है .. ये एक पंजाबी फिल्मो के लिहाज से बड़े बजट की फिल्म है.. और मौजूद छात्रो छात्राओं से फिल्म देखने तक की अपील कही .. कलाकरों ने कहा की उनका रिजल्ट 21 फरवरी को आएगा जिसका इन्हें बेसब्री से इन्तजार है ..
बाईट - रोशन प्रिंस कलाकार फिल्म इश्क ब्रांडी
बाईट - डायरेक्टर फिल्म इश्क ब्रांडी
वी ओ 3 अब फिल्म के कलाकार दिल्ली तक फिल्म का प्रोमो करने में जुटे है इसमें कितनी सफलता मिलती है ये आने वाला शुक्रवार ही बतायेगा .......................
अनिल अत्री ..

Saturday, September 21, 2013

दिल्ली में बिना डिग्री के डॉकटर्स करते है पोस्टमार्टम ..

दिल्ली में बिना डिग्री के डॉकटर्स करते है पोस्टमार्टम ..
एंकर - देश राजधानी में लाशो के सौदागर डॉकटर्स ...लाश के पोस्टमार्टम के बदले भी लिए जा रहे है है पैसे और पोस्टमार्टम भी कर रहे है योग्य डॉक्टर्स ..ये हाल है देश राजधानी दिल्ली का तो दूर दराज क्या होगा ...इसे भ्रष्ट डॉकटर्स  सरकारी अस्पतालों में खुलेआम काम कर रहे है .. एक एनजीओ की मशक्कत के बाद दो डॉकटर्स एंटी करप्सन की पकड में आये ..दोनों डॉकटर्स जहागिर्पुरी के बाबू जगजीवन राम अस्पताल में तैनात थे ... फिलहाल दोनों डॉकटर्स  की पुलिस ने आज तिस हजारी कोर्ट से रीमांड ले ली है ..फिलहाल पूछताछ जारी है इस मामले में सैकड़ो केस ऐसे सामने  आ सकते है जिनमे हुई हो  पोस्टमार्टम रिपोर्ट चेंज..फिलहाल दोनों भ्रष्ट डॉकटर्स से पूछताछ जारी है ..............
वी ओ 1 ये है दिल्ली सरकार का बाबु जगजीवन राम अस्पताल ...यहा भगवान माने जाने वाले डॉकटर्स की हवानिय्त सामने आई है ..यही मोर्चरी में लम्बे वक्त से दो डॉकटर्स तैनात थे डॉ सुदेश और डॉ वीके झा ..... दोनों यहा कई सालो से पोस्टमार्टम कर रहे थे ..यहा आसपास के लम्बे क्षेत्र से शव आते थे और बड़े बड़े केसों का पोस्टमार्टम इस अस्पताल में हुआ है .. लेकिन अधिकारियों की मिलीभगत देखिये यहा मोर्चरी में पोस्ट मार्टम करने वाले इन डॉकटर्स के पास पोस्ट मार्टम के लिए अनिवार्य डिग्री फरेंसिक की डिग्री है ही नही और इन्हें पोस्ट मार्टम के लिए लगा दिया ..और यहा रोते बिलखते परिजनों से पोस्ट मार्टम के बदले पैसे लिए जाते ..इन्साफ के लिए लोगो को पोस्ट मार्टम रिपोर्ट का इन्तजार होता है पर ये भ्रष्ट पैसे लेकर रिपोर्ट ही बदल देते ... ये मर्डर को ख़ुदकुशी साबीत भी कर सकते है ..ये सब जांच व पूछताछ में सामने  आएगा ..जब ये बात पूरे इलाके में फैल चुकी थी तो एक एनजीओ राहुल विचार प्रचार प्रसार समिति सामने आई और आरटीआई से इन डॉकटर्स की डिग्री जानी तो सब हैरान थे इन पर फोरेंसिक की डिग्री ही नही थी ..इसकी शिकायत एनजीओ की तो प्रशासन के हाथ पाव फूल गये अस्पताल के एमएस ने इन्हें मोर्चरी से वार्ड में लगा लिया और दोनों मेडिकल लीव का बहाना बनाकर चले गये फिर एनजीओ प्रेशर किया की वे इस बात को बाहर लीक न करे और इसके बदले एनजीओ को 50 हजार रूपये नकद व 25 हजार रूपये कलाई कमाई से हर महीने देने की बात कही .. एनजीओ इतने बड़े भ्रष्टाचार को देखकर हैरान थी और एनजीओ ने एंटी करप्सन से संर्पक किया ..एंटी करप्सन की टीम ने दोनों डॉकटर्स को रंगे हाथो पचास हजार देते पकड़ लिया ...डॉ सुदेश
बाईट - शिकायत करता ( राहुल प्रचार प्रसार समिति अध्यक्ष )
वी ओ 2 आज दोनों डॉकटर्स को तिस हजारी कोर्ट में पेश किया गया जिसमे एंटी करप्सन को इन दोनों को तिन दिन की पुलिस हिरासत दी है अब दिल्ली पुलिस की एंटी करप्सन विभाग इन दोनों डॉकटर्स से तिन दिन तक पूछताछ करेगी जिसमे कई बड़े खुलासे भी हो सकते है .........
बाईट - एडवोकेट
वी ओ 3 अब जरूरत है इन डॉकटर्स को मोर्चरी तक पहुँचाने वाले एमएस पर भी कारवाई हो साथ ही इनके द्वारा किये गए सभी पोस्टमार्टम की भी जांच की जाए ..........
अनिल अत्तरी दिल्ली ...........................

कांडा केश में गीतिका व उसकी माँ के पोस्टमार्टम के वक्त डॉ सुदेश यही थे उसकी कन्फर्मेशन बाकी है ...

Wednesday, November 21, 2012


केजरिवाल ने कहा की जनता को कई और कसाब को फांसी तोड़ने की जरूरत है .
अरविन्द केजरीवाल की राजनितिक पार्टी नाम से पहले ही लोगों तक पहुंचनी शुरू हुई ..केजरीवाल और उनकी टीम अधिकतर झुग्गी झोपड़ियो में ही जाकर आवाज उठा  रही है जहा पर कोंग्रेस वोट ज्यादा है ...अब केजरीवाल टीम दिल्ली में कोंग्रेस वोट बैंक को निशाना बना रही है।। बुधवार को केजरीवाल टीम शालीमार बाग़ की झुग्गियो में पहुंची यहा करीब छे हजार परिवार इन झुग्गियो में रहते है और केजरीवाल को अछा वोट बैंक इन झुग्गियो में दिखाई   दिया और  सरकार इन झुग्गियो को तोड़ने जा रही है इन झुग्गी वासियों के समर्थन में प्रदर्शन करने केजरीवाल , कुमार विश्वास , मनीष सिसोदिया व अपनी पूरी टीम के साथ पहुंचे और सरकार पर आरोप लगाये की इन झुग्गियो के सामने एक बड़ा कोम्प्लेक्स बन रहा है जिसको इन झुग्गियो की वजह से एन ओ सी नही मिल रही है और इस कोम्लेक्स की एन ओ सी के लिए सरकार इन झुग्गियो को तोड़ने जा रही है ..
वी ओ 1 ये है केजरिवाल और उनकी टीम ...मनीष सिसोदिया , कुमार विश्वास और भी आई ए सी के लोग यहा झुग्गियो में आकर झुग्गी वालो के लिए प्रदर्शन कर रहे है ...जगह है उत्तरी पश्चिमी दिल्ली का शालीमार बाग़ ...यहा इन झुग्गियो में करीब छे हजार परिवार रहते है ..सरकार इन झुग्गियो को हटा रही है ...झुग्गी वासी विरोध कर  रहे है ..केजरीवाल टीम को भी झुग्गी वासियों का समर्थन हासिल करने का अचछा मौक़ा मिल गया और पहुंच गये इन लूग के समर्थन में .... केजरीवाल का आरोप है की यहा बन रहे बड़े कोम्प्लेक्स के लिए झुग्गिया तोड़ी जा रही है केजरिवाला ने कहा की कोम्प्लेक्स को इन झुग्गियो के कारण  एन ओ सी नही मिल रही है और कोम्प्लेक्स को एन ओ सी दिलाने के लिए सरकार इन झुग्गियो को हटाना चाहती है .....और कसाब फांसी पर केजरीवाल ने कहा की जनता को कई और कसाब फांसी तोड़ने की जरूरत है ..
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यहा सरकार के खिलाफ व भर्ष्टाचार के खिलाफ  जमकर नारेबाजी हुई ....लोग ने भी केज्रिवाला के समर्थन से राहत की सांस ली ..लूग को अब विश्वास है की केजरीवाल के आने से उनकी झुग्गिया बच जायेगी ...अब ये झुग्गिया बचे या न बचे पर इन झुग्गियो से केजरीवाल को एक अच्छा समर्थन जरूर मिल सकता है ...
अनिल अत्तरी दिल्ली ........


Tuesday, May 8, 2012

दिल्ली के चोबीस फीसदी से ज़्यादा घरों में आज भी शौचालय नहीं हैं..हर चोथा घर सीवरेज से नही जुदा .....शीला सी एम् ने इसे खट्टा मीठा अनुभव माना ..


दिल्ली के चोबीस  फीसदी से ज़्यादा घरों में आज भी शौचालय नहीं हैं..हर चोथा घर सीवरेज से नही जुदा .....शीला सी एम् ने इसे खट्टा मीठा अनुभव माना ..
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 दिल्ली के दस फीसदी से ज़्यादा घरों में आज भी शौचालय नहीं हैं..शीला सी एम् ने इसे खट्टा मीठा अनुभव माना..ओर बोलने से बची ....सरकारी सर्वे में ये पोल खुली .. दिल्ली के दस फीसदी से ज़्यादा घरों में आज भी शौचालय नहीं हैं।... CM शीला दीक्षित जहागिर्पुरी  ITI में एक कार्यक्रम में आई .....

वी ओ -1 राजधानी दिल्ली के वर्ड सिटी होने के दावे कि पोल खुली ....सरकारी सर्वे में ये पोल खुली .. दिल्ली के दस फीसदी से ज़्यादा घरों में आज भी शौचालय नहीं हैं। गांवों में हालत और भी खराब है। यहां करीब 24 फीसदी घरों में शौचालय नहीं हैं। खासकर नार्थ वेस्ट दिल्ली के गांवों में हालत बहुत खराब है। यहां करीब 36 फीसदी घरों में शौचालय नहीं है। सीवेरेज के मामले में तो दिल्ली की हालत और भी खराब है।  दिल्ली का हर चौथा घर पाइप लाइन वाली सीवेज सिस्टम से नहीं जुड़ा है। उत्तरी पश्चिमी दिल्ली के नत्थूपुरा बुराड़ी इब्राहिमपुर  जैसे गाव जो कि दिल्ली  बसस्टेंड से मात्र करीब दस किलोमीटर कि दूरी पर है ..दिल्ली  विधानसभा  यहा से मात्र पांच से छे किलोमीटर है और यहा इन गावों में आज तक सीवरेज सुविधा नही ...सैकड़ों साल पुराने गाव पर अभी तक सीवरेज नही ....अधिकतर घरों में टॉयलेट सुविधा भी नही..महिलाओं तक को खुले जंगलों में शोचादी के लिए जाना पड़ता है ... वोक स्पोक ....
बाईट -  नरेंदर कुमार ( स्थानीय निवासी बुराड़ी ) - यहा आज तक कोई सीवरेज सुविधा नही ..महिलाओं को खुल्वे में शोचादी जाना पड़ता है ..
बाईट - हन्नू सिंह ( स्थानीय निवासी इब्राहिमपुर ) - ये गाव दिल्ली का गाव बस स्टेंड के पास का गाव फीर भी यहा आज तक सीवरेज सुविधा भी नही ..
बाईट - जगदीश सोदा ( प्रधान नत्थूपुरा गाव )- यहा आज तक कोई सुविधा नही ...
बाईट - भजनलाल ( स्थानीय निवासी )- यहा न सीवरेज है न टॉयलेट .बूरा हाल है .....
वी ओ फाइनल - अब ये रिपोर्ट सरकार के दावों कि पोल खोल रही है ..और सरकार है कि इसे खट्टा मीठा अनुभव मान रही है ..
बाईट - शीला दीक्षित ( CM दिल्ली ) टेक्स्ट - ये खट्टा मीठा अनुभव है कडवा तो नही ...
वी ओ 3 CM शीला दीक्षित जहागिर्पुरी  ITI में एक कार्यक्रम में आई और TATA मोटर्स के साथ जहागिरपुरी ITI का तालमेल हुआ जिसमे  
अब इस ITI के छात्र सीधे TATA मोटर्स में अभ्यास करेगें ..TATA मोटर्स यहा के छत्रों को नोकरी भी देगा ...
अनिल अत्तरी दिल्ली .............

Sunday, May 6, 2012

Questionare प्रश्नावली


Questionare
समाजिक शोध और सर्वेक्षण के क्षेत्र में सामग्री एकत्रित करने के लिए जिन विधियों का प्रयोग किया जाता है, उनमें प्रश्नावली भी एक है। इसका महत्व तथ्य संकलन और आंकडे़ एकत्रित करने के लिए बहुत होता है। यह प्राथमिक तथ्यों को संकलित करने में बहुत योगदान देती है। इसमें विषय समस्या से संबंधित प्रश्न रहते हैं। आमतौर पर सर्वेक्षण के लिए इसके अलावा अनुसूची का भी प्रयोग किया जाता है। क्योंकि ये दोनों ही समान सिद्धांतों पर आधारित होती है। इसी आधार पर लुण्डबर्ग ने प्रश्नावली को एक विशेष प्रकार की अनुसूची माना है जो प्रयोग की दृष्टि से अपनी निजता स्थापित करती है। 
अर्थ-
       साधारणतया किसी विषय से संबंधित लोगों से सूचना प्राप्त करने के लिए बनाए गए प्रश्नों की सुव्यवस्थित सूची को प्रश्नावली की संज्ञा दी जाती है। अर्थात प्रश्नावली अनेक प्रश्नों से युक्त एक सूची होती है जिसमें अध्ययन विषय  से जुड़े  विभिन्न पक्षों के बारे में पहले से तैयार किए गए प्रश्नों का समावेश होता है। शोधकर्ता इसे डाक के माध्यम से उत्तरदाताओं को भेजते है। उत्तरदाता उसे पढ़कर, समझकर और उसमें पूछे गए प्रश्नों के उत्तर भरकर पुनः डाक से शोधकर्ता के पास भेज देता है। आम तौर पर यह कहा जा सकता है कि विषय समस्या से संबंधित तथ्यों को संग्रहित करने के उद्देश्य से निर्मित क्रमबद्ध प्रश्नों की वह सूची जिसका उपयोग डाक द्वारा किया जाता है प्रश्नावली कहलाती है।
परिभाषा- 
        जे डी पोप ने लिखा है कि एक प्रश्नावली को प्रश्नों के एक समूह के रूप में परिभाषित किया जा सकता है, जिसका उत्तर सूचनादाता के बिना एक शोधकर्ता अथवा प्रगणक की व्यक्तिगत सहायता से देना होता है। 
बोगार्डस ने प्रश्नावली को परिभाषित करते हुए लिखा है। प्रश्नावली विभिन्न व्यक्तिओं को उत्तर देने के लिए दी गई प्रश्नों की एक तालिका है। 
प्रश्नावलियो की निर्माण विधियां -
                       प्रश्नावली प्रविधि तथ्य एकत्रित करने की एक प्रमुख प्रविधि है। इसलिए यह आवश्यक होता है कि प्रश्नावली का निर्माण इस तरह से किया जाए कि उपयोगी साबित हो । प्रश्नावली का निर्माण जितना सावधानीपूर्वक एवं सुव्यवस्थित रूप से किया जाता है। शोध के लिए सामग्री का संकलन उतना ही उपयोगी हो जाता है। प्रश्नावली में सूचनादाताओं को स्वयं ही प्रश्नों को समझकर उनका उत्तर देना होता है। इसलिए प्रश्नावली के निर्माण के समय सूचनादाताओं के ज्ञान के आधार क्षेत्र को बढ़ाना होता है। इसमे बिना शोधकर्ता की मदद के ही उत्तर देना होता है। इसलिए प्रश्नावली का निर्माण इतना सरल और स्पष्ट होना चाहिए कि उत्तरदाता उसे आसानी से भरकर भेज सके। प्रश्नावली की रचना को तीन भागों में विभाजित किया जा सकता है। जो निम्नानुसार है-
 1 अध्ययन की समस्या
  
 2 प्रश्नों की उपयुक्तता
 3 बाहरी आकार
1 अध्ययन की समस्या- प्रश्नावली का निर्माण करते समय सबसे पहले यह आवश्यक होता है कि अध्ययन की समस्या को भली भांति समझा जाए। न केवल इसे समझना बल्कि इसका विश्लेषण करना भी आवश्यक है। इसमें निम्न बातों का ध्यान रखना आवश्यक होता है।
1 पूर्ण जानकारी
2 क्षेत्र एवं सूचनादाता
3 अध्ययन की इकाई
1 पूर्ण जानकारी- प्रश्नावली का निर्माण करते समय अध्ययन समस्या की पूर्ण जानकारी प्राप्त कर लेनी चाहिए।  इसे न केवल समझ लेना चाहिए बल्कि पूर्णतया देख’-परख भी लेना चाहिए। अगर ऐसा नहीं किया जाता है तो अध्ययनकर्ता को प्रश्न रचना के समय अनेक समस्याओं का सामना करना पड़  सकता है। इसलिए अध्ययनकर्ता का  समस्या के विभिन्न पक्षों से परिचित होना आवश्यक होता है। अध्ययनकर्ता को चाहिए कि वह विषय से संबंधित विशेषज्ञों से भी पूर्ण जानकारी प्राप्त कर ले। ऐसा करने पर ही प्रश्नावली का निर्माण उचित चरणों में पूरा हो सकेगा।
2 क्षेत्र और सूचना दाता - प्रश्नावली का निर्माण करते समय क्षेत्र और सूचनादाता के बारे में जानकारी प्राप्त करना आवश्यक होता है। अर्थात क्षेत्र का विस्तार कितना है और सूचनदाताओं की संख्या कितनी है इन बातों का ध्यान आवश्यक होता है। उदाहरण के लिए यदि भौगोलिक क्षेत्र बड़ा हो और समस्या की प्रकृति सामान्य हो तो सूचनादाता की संख्या अधिक होती है। इसमें निर्दशन प्रणाली के माध्यम से सूचनादाताओं की संख्या का निर्धारण करना पड़ता हैं।
3 अध्ययन की इकाई - प्रश्नावली का निर्माण करते समय यह स्पष्ट करना होता है,कि अध्ययन की इकाई क्या है। ऐसा करना इसीलिए आवश्यक होता है ताकि उत्तरदाता इन इकाईयों को एक ही अर्थ में समझे ताकि उसे एक ही प्रकार की सूचनाएं प्राप्त की जा सके । उदाहरण के लिए यदि बालकों का अध्ययन करना हो प्रश्नावली में बालकों की आयु का स्पष्ट उल्लेख होना चाहिए।
4 प्रश्नों की उपयुक्तता - इससे तात्र्पय यह है कि प्रश्नावली में किसी भी प्रश्न को शामिल करने के पूर्व वह विषय से संबंधित सूचना का संकलन करने में किस हद तक सहायक होगा। अनुपयुक्त प्रश्नों के शामिल होने से धन,समय और श्रम का दंुरूपयोग होता है और न ही अपेक्षित सफलता मिल पाती है। इसलिए प्रश्नों का उपयुक्त होना अंत्यत आवश्यक होता है। प्रश्न का निर्माण सरल,सटीक और व्यवस्थित होना चाहिए क्योंकि प्रश्नावली निर्माण के समय हमेशा इस बात का ध्यान रखा जाना चाहिए कि उत्तरदाता को बिना शोधकर्ता की सहायता से ही प्रश्नो को उत्तर देना रहता है। अर्थात प्रश्न हर ढंग से उपयुक्त हो । उपयुक्त प्रश्नो का अपना एक अलग महत्व होता है।
प्रश्नों की उपयुक्तता के नजरिये से निम्न बातें आवश्यक होती है।
1 प्रश्नों की स्पष्टता और विशिष्टता- प्रश्नावली का निर्माण करते समय शोधकर्ता को हमेशा इस बात का ध्यान रखना होता है कि प्रश्न स्पष्ट और विशिष्ट हो। अर्थात ऐसे प्रश्नों के निर्माण करने से हमेशा बचा जाना चाहिए जो अस्पष्ट और अनिश्चित वाले हो या फिर भ्रामक हो । अ्रगर ऐसे प्रश्नों का समावेश प्रश्नावली मे होगा तो वह दोषपूर्ण बन जाएगी जिससे शोध का उद्देश्य भी पूरा नही होगा । इसके साथ ही अस्पष्ट, दोषपूर्ण, द्विअर्थी और अप्रचलित प्रश्नों के प्रयोग से भी बचना चाहिए। प्रश्नो के निर्माण में विशिष्ट शब्दावली का भी प्रयोग नही किया जाना चाहिए।
2 सरल प्रश्न- अगर प्रश्नावली में सरल प्रश्नो का समावेश होगा तभी प्रश्नों की उपयुक्तता साबित होगी । अगर प्रश्न सरल होंगें तो सामान्य ज्ञान वाला भी उसे ठीक से समझेगा और उसका सही सही जवाब देगा। साथ ही प्रश्नों के सरल रहने से अध्ययनकर्ता के बिना भी उसका उत्तरदाता अपेक्षित अर्थ लगाकर प्रश्नो का सही सही जवाब देगा। क्योंकि खुद प्रश्नकर्ता उत्तरदाता के पास नही होता इसलिए सरल प्रश्न होना आवश्यक होता है।
3 संक्षिप्त और श्रेणीबद्व उत्तर - प्रश्नावली के निर्माण में इस बात का ध्यान देना चाहिए कि उसमें प्रश्न संक्षिप्त ही रहें। अगर प्रश्न छोटे होगें तो प्रश्नावली भरते समय उत्तरदाता जवाब देने में बोर नहीं होगा ना ही उसे कोई हिचकिचाहट होगी । प्रश्न न केवल न संक्षिप्त होने चाहिए बल्कि उनमें क्रमबद्वता भी होनी चाहिए। यदि यह उत्तर हां या न में होतो यह प्रश्न ज्यादा ठीक माना जाता है।साथ ही बहुविकल्पनात्मक प्रश्न भी सही होते है।क्यों कि इसमें उत्तर दाता को अपने मन से विकल्प चुने जाने की आजादी होती है।
4 वैषयिक प्रश्न- प्रश्नावली के निर्माण में इसकी उपयुक्तता इस बात पर निर्भर करती है वैषयिक प्रश्नों का समावेश इसमें किया जाए। इस दौरान प्रश्नों में किसी प्रकार का झुकाव नही होना चाहिए। अ्र्रगर इस तरह के प्रश्न इसमें शामिल है तब उत्तरदाता से सही और वास्तविक उत्तर निकलवाए जा सकेगें।
5 कम प्रश्न- प्रश्नावली में कम से कम प्रश्नो का समावेश करना चाहिए। इससे प्रश्नावली जल्दी भर जाएगी और उत्तरदाता की अभिरूचि भी बनी रहेगी। अधिक प्रश्नों के समावेश से प्रश्नावली  के निर्माण में समय,धन और श्रम तीनों की बर्बादी होती है।
6 बचाव वाले प्रश्न- प्रश्नावली में उत्तरदाता के गोपनीय जीवन से संबंधित प्रश्नों को शामिल नही किया जाना चाहिए। गोपनीय और गहन सूचनाओं वाले प्रश्नों से हमेशा बचना चाहिए क्योंकि ऐसे प्रश्नों के उत्तर कोई भी आसानी से नहीं देता है। अपराधी प्रवृत्ति और यौन व्यवहार से संबंधित प्रश्न इसी तरह के होते हैं। इसी तरह वैयक्तिक, भावनात्मक और प्रतिष्ठा वाले प्रश्नों से भी बचा जाना चाहिए। इसके अलावा पक्षपातपूर्ण और रूढ़िवादी प्रश्नों से भी बचा जाना चाहिए।
7 स्पष्ट भाषा- प्रश्नों में चयन में सावधानी बरती जानी चाहिए बल्कि भाषा की स्पष्टता पर भी ध्यान देना चाहिए। स्पष्ट भाषा उत्तरदाता आसानी से समझ जाते हैं। इसमें कठिन, अस्पष्ट, अप्रचलित दुरूह और क्लिष्ट शब्दों का चयन नहीं किया जाना चाहिए। बहु अर्थी, भावात्मक और अनुमानित सूचना वाले शब्दों का भी प्रयोग नहीं करना चाहिए। स्पष्ट भाषा के साथ- साथ प्रश्नावली की इकाइयॉं भी स्पष्ट होना चाहिए।
8 क्रमबद्वता- प्रश्नावली का निर्माण करते समय प्रश्नों को स्वाभाविक रूप से क्रमबद्व और व्यवस्थित करने पर ध्यान दिया जाना चाहिए। साथ ही प्रश्नों के परस्पर अंतर्सबंद्वता का गुण भी होना चाहिए । इससे प्रश्नों में तारतम्यता बनी रहेगी एवं प्रत्येक प्रश्न का उत्तर अगले प्रश्न के उत्तर के लिए पूरक कार्य करेगा। अधिक प्रश्नों को शिर्षक और उपशीर्षकों में विभाजित किया जा सकता है। गलत, व्यंग्यात्मक, दकियानूसी, कल्पनात्मक और प्रभावशील प्रश्नों को इसमें शामिल नही किया जाना चाहिए।
9 बाह्य आकार - प्रश्नावली में प्रश्नो के निर्माण के साथ-साथ उसमें भौतिक बनावट का भी महत्व होता है। उत्तरदाता के पास नही होने के कारण प्रश्नकर्ता उसका ध्यान आकर्षित करने के लिए प्रश्नावली की बाहरी आकृति जैसे - उसका आकार, कागज, छपाई और रूप रंग आदि पर भी ध्यान दिया जाना आवश्यक होता है। प्रश्नावली के बाहरी आधार के अन्र्तगत निम्न बातों पर ध्यान देना चाहिए।
1 आकार - प्रश्नावली का निर्माण करते समय इसे आकर्षक आकार में निर्मित किए जाने की आवश्यकता होती है। इसे सामान्यतः फुलस्केप आठ बाय बारह और नौ बाय ग्यारह के आकार के कागज पर बनाया जाना चाहिए। लंबे लिफाफे में मोड़कर रखने के कारण यह आकार बहुत उपयुक्त होता है। कम पृष्ठ होने से डाक खर्च भी कम आता है। साथ ही इसे उत्तरदाता तक भेजना भी आसान हो जाता है।
2 कागज- प्रश्नावली का निर्माण करते समय उसके कागज पर ध्यान देना आवश्यक होता है। यह कागज चिकना, कड़ा और टिकाउ होना चाहिए। इसका आकर्षक स्वरूप प्रश्नावली को सुंदर बनाता है। जबकि खुरदरा कागज न केवल जल्दी फट जाता है साथ ही इसकी छपाई भी अच्छी नहीं होती है। एक जैसे शोध के लिए भेजे जाने वाली प्रश्नावलियां अलग अलग कागज पर होना चाहिए।
3 छपाई- प्रश्नावली को अक्सर या तो छाप दिया जाता है या साइक्लोस्टाइल करवाया जाता है। इन दोनों ही तरीकों में इस बात का ध्यान रखा जाता है कि छपाई शुद्ध और स्पष्ट हो ताकि आसानी से इसे पढ़ा जा सके । स्याही न फैले इस बात का भी ध्यान रखा जाना चाहिए।
4- हाशिया छोड़ना- प्रश्नावली का निर्माण करते समय बायीं ओर 3 बाय 8 और दायीं ओर 1 बाय 7 या 1 बाय 6 का हाशिया छोड़ना चाहिए। इस स्थान पर टिप्पणी लिखी जा सकती है। इसमें शब्दों और दो प्रश्नों के मध्य स्थान छोड़ा जाना चाहिए।
5 प्रश्नावली की लंबाई- प्रश्नावली का निर्माण करते समय इस बात का ध्यान रखा जाना चाहिए कि इसमें प्रश्नों की संख्या इतनी नहीं होना चाहिए कि संपूर्ण प्रश्नावली अनेक पृष्ठों में छप सके। लंबी प्रश्नावली से उत्तरदाता की रूचि खत्म हो जाती है। इसकी लंबाई इतनी होना चाहिए कि इसे कम से कम आधे घंटे मेें भरा जा सके। अभी तक पचास पृष्ठों तक वाली प्रश्नावली उपयोग में लाई जा चुकी है।
6 रूप- रंग- प्रश्नावली का निर्माण करते समय उसके रूप रंग भी ध्यान देना चाहिए। प्रश्नावली इतना आकर्षक होना चाहिए ताकि उत्तरदाता उस पर लिखने के लिए बेताब हो जाए। इस पर अक्षर स्पष्ट होना चाहिए साथ ही कागज मोटा और अच्छा होना चाहिए। रंगीन कागज का प्रयोग से यह और भी आकर्षक हो जाता है। इस प्रकार यह पता चलता है कि प्रश्नावली का निर्माण करते समय उसके रूप रंग और बाहरी आकर्षण पर ध्यान दिया जाना चाहिए।
7 मदों की व्यवस्था- प्रश्नावली का निर्माण करते समय इस बात का ध्यान रखा जाना चाहिए कि इसमें एक विषय से संबंधित सभी प्रश्नों को एक साथ एक क्रम में लिखा जाए। आवश्यकतानुसार प्रश्नों को विभिन्न उपसमूहों में भी वर्गीकृत किया जा सकता है। प्रश्नावली में शीर्षक, उपशीर्षक एवं सारणियों आदि सही क्रम में छपे होने चाहिए जिससे अध्ययन करने में सुविधा प्रतीत हो।
              
                इस तरह हम कह सकते है। प्रश्नावली के निर्माण में न केवल प्रश्नो पर ध्यान देना चाहिए साथ ही इसके बाहरी स्वरूप पर भी ध्यान देने की आवश्यकता होती है..अनिल अत्री .........

Scheduling अनुसूची


Scheduling
समाजिक शोध के क्षेत्र में तथ्य संकलन के लिए जिन विधियों का प्रयोग किया जाता है उनमें एक अनुसूची है। इसमें प्राथमिक और द्वितियक स्त्रोंत होते हैं। प्राथमिक स्त्रोत के अन्र्तगत घटनाओं को स्वंय देखकर, सुनकर या संबंधित व्यक्तिओं से मिलकर तथ्यों को एकत्रित किया जाता है। द्वितीयक स्त्रोतों के अन्र्तगत अध्ययनकर्ता विषय से संबंधित प्रलेखों का अध्ययन कर तथ्य एक़ित्रत करता हैं। समाज की विभिन्न समस्याओं के अध्ययन के लिए सामाजिक शोध के क्षेत्र में प्रश्नावली और सूची बनाने का व्यापक महत्व होता है बाहरी रूप से यह दोनो काफी हद तक समान दिखते हैं लेकिन वास्तविक अर्थो में इन दोनो की प्रकृति और आयोग की प्रक्रिया एक दूसरे से अलग होती है।
परिभाषा-
    सामाजिक शोध के क्षेत्र में अनुसूची तथ्य को एकत्रित करने के लिए महत्वपूर्ण विधि हैं
पीवी यंग और गुड्डे एवं हॉट के अनुसार अनुसूची प्रश्नों की वह सूची है जिसका प्रयोग साक्षात्कार के दौरान सामाजिक समस्याआ के अध्ययन में किया जाता है।
लुण्डबर्ग के अनुसार अनुसूची का प्रयोग उत्तरदाता से पूछे जाने वाले प्रश्नों को याद करने से शोधकर्ता को बचाता है। क्योंकि शोधकर्ता के साथ प्रश्नों की सूची रहती है। और वह उत्तरदाता से एक जैसे प्रश्न पूछता है। अनुसूची एक सामान्य अवधारणा है जिसका प्रयोग किसी भी प्रणाली द्वारा तथ्यों के सग्रंह मंें किया जाता है।
बेगार्डस के अनुसार अनुसूची उन तथ्यों को प्राप्त करने की औपचारिक प्रणाली का प्रतिनिधित्व करती है जो वैषयिक रूप में है। तथा सरलता से प्रत्यक्ष योग्य है।
विशेषताएं-
एक अच्छी या उत्तम अनुसूची प्रश्नों और उत्तरों की गुणवत्ता पर निर्भर करती है। अर्थात प्रश्न इस प्रकार होना चाहिए जिससे वास्तविक तथ्य मालूम किए जा सकें। साथ ही प्रश्नों का सूचनादाता सही अर्थो में समझकर उचित उत्तर दे सके। एक बेहतर अनुसूची में निम्नलिखित विशेषताएं होती हैं।
1 सही संदेश वाहन- एक अच्छी अनुुसूची की पहली विशेषता यह है कि इसमें प्रश्नों को इस प्रकार पूछा जाता है कि उन प्रश्नों के संंबंध में किसी भी उत्तरदाता के मन में कोई गलत धारणा न पनप पाए। अर्थात शोधकर्ता के द्वारा पूछे गए प्रश्न उसी रूप में उत्तरदाता को मिले। अनुसूची की भाषा सरल, स्पष्ट, भ्रमरहित और अर्थ प्रदान करने वाली होना चाहिए।
2 सही प्रत्युतर- उत्तम अनुसूची की दूसरी विशेषता के रूप में सही प्रत्युतर प्राप्त होना होती है। इसकी पहचान तभी कायम होती है जब उस अनुसूची के आधार पर सूचनादाता सही उत्तर देता है जो शोधकर्ता के लिए उपयोगी और आवश्यक होता है। सही प्रत्युतर का मायना यह है कि सूचनादाता द्वारा दी गई जानकारी वास्तविक हो और उसमें कोई दुविधा न हो।
3 प्रश्नों का उचित क्रम- एक अनुसूची में प्रश्नों का क्रमबद्ध तरीके से लिखा जाना चाहिए ताकि उनमें आंतरिक संबंधता आ सके और उत्तरदाता सभी प्रश्नों की व्यवस्थित रूप में जानकारी दे सके ।
4 सरल और स्पष्ट प्रश्न- एक अच्छी अनुसूची में प्रश्न सरल और स्पष्ट भाषा में होना चाहिए ताकि उत्तरदाता को प्रश्न समझने में आसानी रहे। हालांकि इस विधि में सूचनादाता और प्रश्नकर्ता एक दूसरे के समक्ष रह कर चर्चा करते है उसके बाद भी इस बात का ध्यान रखा जाना चाहिए कि प्रश्न सरल और स्पष्ट हों।
5 सीमित आकार - प्रश्नों की संख्या समस्या की प्रकृति पर निर्भर करती है फिर भी एक अच्छी अनुसूची का आकार निश्चित होना चाहिए इसमें अनुसंधान की समस्या से संबंधित प्रश्नों को ही शामिल किया जाना चाहिए।
6 क्रास प्रश्नों की व्यवस्था- एक अच्छी अनुसूची उसे माना जाता है जिसमें समस्या से संबंधित विभिन्न पहलुओं के बारे में क्रास प्रश्न पूछे जाने की व्यवस्था हो ताकि सूचनादाता द्वारा दी गई जानकारी की जांच प्रश्नों के आधार पर की जा सके।
7 सामान्य शब्द- अनुसूची में सामान्य शब्दों का प्रयोग किया जाना चाहिए अध्ययनकर्ता को अनुसूची में खड़ी बोली का प्रयोग नहीं करना चाहिए। हमेशा सीधे और बोल चाल वाले शब्द ही प्रयोग में लाने चाहिए।
8 सम्मानजनक प्रश्न- इसमें हमेशा सम्मानजनक प्रश्नों का ही प्रयोग किया जाना चाहिए ताकि उत्तरदाता को किसी भी प्रकार का आघातों न पहुंचे। आमतौर पर अध्ययनकर्ता को प्रश्नों में विकट शब्दों के प्रयोग से बचना चाहिए।
9 सांख्यिकीय विवेचना - इसमें ऐसे प्रश्नो का समावेश होना चाहिए ताकि अध्ययनकर्ता उत्तरदाताओे द्वारा दी गई जानकारी के आधार पर तथ्यों की सांख्यिकीय विवेचना कर सके।
10 सूख का अनुभव - इसके अलावा प्रश्न ऐसे हो जिससे सुख का अनुभव हो साथ ही छोटे प्रश्नो का उपयोग भी होना चाहिए। प्रश्न ऐसे होना चाहिए जो अध्ययन के विषय की प्रकृति और उद्देश्य से संबंधित हो ।

अनुसूची प्रश्नों की एक सूची होती है। इसका निर्माण सोच समझकर सावधानीपूर्वक किया जाता है। यह निर्माण करना कोई सरल कार्य नहीं होता है। इसके निर्माण की प्रक्रिया के विभिन्न स्तर होते हैं। यह स्तर निम्नलिखित हैं।
1  अनुसूची निर्माण के पहले चरण में इसके निर्माण से संबंधित विभिन्न पक्षों पर विचार किया जाता है। इसके निर्माण के पहले यह निश्चित कर लेना चाहिए कि इसमें अध्ययन विषय से संबंधित किन किन विषयों को सम्मिलित किया जाएगा। इस स्तर में शोधकर्ता अध्ययन की समस्या के संबंध में जानकारी प्राप्त करता है। ऐसा करना इसलिए आवश्यक होता है क्योंकि अगर अध्ययन की समस्या की प्रकृति का पूर्ण ज्ञान नहीं होगा तब तक उसके संबंध में प्रश्नों का ज्ञान भी नही हो सकेगा। इससे शोधकर्ता को यह पता चल जाता है कि विषय में कौन कौन से पक्ष अधिक और कौन कौन से कम महत्वपूर्ण हैं। इसके अलाव अध्ययन की समस्या के मुख्य पहलुओं का भी पता चल जाता है जिनके माध्यम से विभिन्न पहलुओं के बारे में जानकारी प्राप्त की जा सकती है। पहले से ऐसा कर लेने से अनुसूची में प्रश्नों का एक संतुलित अनुपात बनाए रखना संभव हो पाता है। साथ ही इसमें अनावश्यक प्रश्नों का जमाव होने से भी बचा जा सकता है। पूर्ववर्ती विचार और समस्या के संबंध में आवश्यक जानकारी इसलिए भी आवश्यक होती हैं क्यों कि शोधकर्ता विषय के संबंध में एक संतुलित धारणाओं को पनपाए बिना ही अनुसूची में उन सभी मदों और पहलुओं को सम्मिलित करना चाहते हैं। जो उन्हे महत्वपूर्ण और रूचिकर प्रतीत होतो हैै। इस प्रवृत्ति से धन,समय और शक्ति का अपव्यय होता है। इस स्थिति से बचने के लिए एक संतुलित प्रश्न सूची को बनाए रखना आवश्यक होता है। इसको बनाए बिना यह संभव है कि कुछ महत्वहीन पक्षों को  अनुसूची में मान्यता मिल जाए और महत्वपूर्ण पक्ष अनुसूची से छुट जाए। इस लिए पूर्व ज्ञान के आधार पर अध्ययन समस्या के संबंध में जानकारी प्राप्त की जाती है।
 
2  दूसरे चरण में इसका आकार निर्धारित किया जाता है। इस स्तर में शोधकर्ता यह निश्चित करता है कि अनुसूची के अंदर कितने प्रश्न रखें जाएं। अनुसूची का आकार, समस्या की प्रकृति, अध्ययन क्षेत्र की प्रकृति, अध्ययन के लिए प्राप्त धनराशि और समय आदि पर निर्भर करती है। अध्ययन विषय को विभिन्न पक्षों में विभाजित किया जाता है। साथ ही यह भी सुनिश्चित किया जाता है कि प्रत्येक उपविभाग के संबंध में सभी विषय स्पष्ट हो। इसके लिए दो बातों का ध्यान रखना आवश्यक होता है। इसमें पहली बात यह है कि इस प्रकार के प्रश्नों को अनुसूची में सम्मिलित करने पर पहलू विशेष पर अधिक ध्यान दिया जाए। दूसरी बात यह कि इस प्रकार के प्रश्नों के उत्तरों से प्राप्त सूचनाओं का शोध के उद्देश्य की पूर्ति में अधिकाधिक उपयोग हो। इस प्रकार यह कहा जा सकता है कि इस स्तर में अध्ययन विषय के विभिन्न पक्षों के उपविभागों और उनसे संबंधित प्रश्नों के विस्तार, प्रकृति और उसकी उपयोगिता के विषय में निश्चित कर लिया जाता है। अगर मनोवृत्ति, भावनाओं ओर विचार आदि मनोवैज्ञानिक समस्याओं के अध्ययन के लिए अनुसूची का निर्माण किया जाता है तो इसका आकार बड़ा रखा जाता है। इसके विपरित घरेलू दशा, साक्षरता, व्यवसाय और पोशाख स्टाईल आदि समस्याओं के अध्ययन के लिए अनुसूची का निर्माण किया जात है तो अनुसूची का आकार छोटा रखा जाता है। साथ ही अगर अध्ययन के लिए धनराशि एवं समय अधिक प्राप्त रहता है। तब तुलनात्मक रूप में अनुसूची का आकार बडा रखा जाता है एवं यदि धनराशि और समय कम रहता है तब अनसूची का आकार छोटा रखा जाता है।
3  अनुसूची के निर्माण की प्रक्रिया का तीसरा स्तर प्रश्नों के निर्माण से संबंधित होता है। इस स्तर पर इस बात की सावधानी रखनी पड़ती है कि जल्दबाजी में प्रश्नों का निर्माण न हो जाए। प्रश्नों की प्रकृति पर ही यह निर्भर करता है कि उत्तरदाता उन प्रश्नों के सही अर्थ को समझकर सही उत्तर दे सकेगा या नहीं । इसलिए इस बात का हमेशा ध्यान रखा जाना चाहिए कि प्रश्नों की भाषा जटिल, अस्पष्ट, संदेहयुक्त और बहुअर्थक न हो । साथ ही जिन प्रश्नों से उत्तरदाताओं को कोई क्षोभ पहुंचे या उत्तर देने में किसी प्रकार का संकोच हो, ऐसे प्रश्नों के निर्माण से भी बचा जाना चाहिए। सरल, स्पष्ट और ठीक ढंग से पूछे गए विनम्र प्रश्न उत्तरदाता से सही उत्तर स्वयं ही प्राप्त कर लेता है। जबकि गलत ढंग से पूछे गए प्रश्न उत्तरदाता के मन को विचलित कर देते है। जिसके चलते वह या तो उत्तर नहीं देता और देता भी है तो अनमने ढंग से । विषय से संबंध न रखने वाले प्रश्नों को भी शामिल नही किया जाना चाहिए। कहने का तात्पर्य यह है कि प्रश्नों का निर्माण सावधानीपूर्वक किया जाना चाहिए ताकि प्रश्न विश्वसनीय तथ्य संग्रह करने में सक्षम हों। प्रश्नों का निर्माण करते समय इस बात का ध्यान रखा जाता है कि समस्या के विभिन्न पहलूओं के संबंध में विस्तृत और विश्वसनीय आंकड़े इन प्रश्नों द्वारा प्राप्त हो सके। हर संभव प्रयास किया जाना चाहिए कि अनुसूची में कई अर्थो वाले या फिर उत्तरदाताओं को विचलित करने वाले प्रश्नों का चयन नही करना चाहिए।
4  चैथे स्तर में प्रश्नों को एक सिल- सिलेवार ढंग से क्रमबद्व सजाया जाता है। इस समस्या से संबंधित सभी प्रश्न को एक ही जगह रखा जाता है। साथ ही यह भी ध्यान रखा जाता है कि उत्तरदाताओं की आसानी के लिए कैसी क्रमबद्धता होनी चाहिए। उत्तरदाताओं का नाम, लिंग, आयु, ज्ञान, धर्म, वैवाहिकी, स्थिति, आमदनी और व्यवसाय आदि की जानकारी से संबंधित प्रश्नो का सबसे उपर और मुख्य प्रश्नों को नीचे रखा जाना चाहिए। लेकिन सबसे उपर अध्ययन की समस्या के विषय का उल्लेख भी किया जाना चाहिए। यदि इसमें उस विषय के उद्देश्य भी दिया गया हो तो यह और भी अच्छा माना जाता है। प्रश्नो का क्रम में बनाने से उत्तरों के माध्यम से तथ्यों की प्राप्ति उसी क्रम में होती है, जिस क्रम में तथ्यों की व्याख्या, विश्लेषण और रिपोर्ट लिखनी होती है। क्रम से लगे प्रश्नों के द्वारा उत्तरदाता से भी शीघ्रता से उत्तर मिल जाता है। सरल से जटिलता की ओर प्रश्न का क्रम होने से उत्तरदाता सरल प्रश्नों को पहले करके जटिल के लिए मानसिक तौर पर तैयार भी हो जाता है। क्रमबद्वता के दौरान यह भी ध्यान रखना चाहिए कि ऐसा कोई प्रश्न न शामिल न हो जिसका उत्तर न मिल सके ।
5  अनुसूची निर्माण की अंतिम प्रक्रिया अनुसूची की सार्थकता की जांच करने से संबंंधित होता है। अर्थात प्रश्नों को क्रमबद्व रूप में रखने के बाद अनुसूची के दोषों की जानकारी प्राप्त करने के लिए पूर्व- परीक्षण या सर्वेक्षण कराया जाता है। इसके अलावा कुछ पर अनुसूची लागू कर देखा भी जाता है कि उसमें कोई अनावश्यक प्रश्न तो शामिल  नही है। अगर कोई प्रश्न छूट गया है तो उसका भी पता चल जाता है। अनुसूची को दोषरहित और अधिक सार्थक बनाने के उद्दश्य से पूर्व सर्वेक्षण किया जाता है। पूर्व- सर्वेक्षण के अनुभव के आधार पर अनुसूची में संशोधन  किया जाता है और अंतिम रूप अनुसूची का निर्माण किया जाता है। ऐसा कर लेने से आगे आने वाली समस्याओं का निराकरण हो जाता है।

Types of scales
किसी भी अध्ययन को यथार्थता और वैज्ञानिकता प्रदान करने के लिए निश्चित अनुमापन  बहुत आवश्यक होता है। सामाजिक विज्ञान में अध्ययन को यर्थाथ बनाने के लिए समाजिक घटना के गुणात्मक और गणनात्मक दोनो पक्षों का अध्ययन अनिवार्य होता है। इस प्रयास का परिणाम अनेक मापक यंत्रों, पैमानों अनुमापों अथवा स्केलिंग प्रविधियों का निर्माण है जिनकी सहायता से विभिन्न सामाजिक घटनाओं और समस्याओं के प्रति लोगों की मनोवृत्तियांें, नजरिया और दूरी को मापा कर इनका मूल्याकन किया जा सकता है।
अनुमापन या पैमाने किसी सामाजिक घटना या समस्या के विषय में व्यक्तिओं की राय और मनोवृत्तियों को मापने के यंत्र हैं। पैमाने गुणात्मक तथ्यों को गणनात्मक तथ्यों में परिवर्तित करने की प्रविधियां है  और क्रम का निर्धारण करने में इनका विशेष महत्व है। अतः पैमाना किसी घटना अथवा वस्तु को मापने का एक यंत्र है। अध्ययन वस्तु की प्रकृति के अनुसार ही पैमानों का निर्माण किया जाता है। जिस प्रकार प्राकृतिक विज्ञानों में विभिन्न वस्तुओं को मापने के यंत्र भिन्न- भिन्न होते हैं उसी प्रकार सामाजिक घटना की विशिष्ट प्रकृति को ध्यान में रखते हुए उसी के अनुसार पैमानों का निर्माण किया जाता है ।
परिभाषा-
 गुडे तथा हॉट के मुताबिक- अनुमापन प्रविधियों में अन्तर्निहित समस्या इकाइयों की श्रेणियों को एक क्रम के अन्तर्गत व्यवस्थित करने की है। दूसरे शब्दों में अनुमापन प्रविधियां गुणात्मक तथ्यों की श्रेणियों को गुणात्मक श्रेणियों में बदलने की पद्धतियां है।
पी वी यंग के अनुसार- किसी वस्तु या घटना की मात्रा या भार को मापने के लिए जिस पैमाने का प्रयोग किया जाता है, उसके आधार पर जिन अनुमापन साधनों का निर्माण किया जाता है, उसे अनुमापन प्रविधि कहते है।
डॉ आर एन मुकर्जी - अनुमापन का तात्र्पय पैमाइश की उस विधि से है जिसके द्वारा गुणात्मक तथा अमूर्त सामाजिक तथ्यों या घटनाओं को गणनात्मक स्वरूप दिया जाता है।
पैमाना पध्दतियों के प्रकार -
गुणात्मक मीडिया शोध में क्रमाबद्धता, तार्किकता और वैज्ञानिकता लाने के लिए पैमाने के प्रयोग को अधिक महत्वपूर्ण समझा जा रहा है। श्रीमती यंग के अनुसार दो प्रकार के मानवीय व्यवहार के माप के लिए विभिन्न यंत्रों का निर्माण हुआ है।
1  मनुष्य के संचार तथा व्यक्तिगत को मापने वाले पैमाने जिनके द्वारा प्रवृत्तियां, नजरिया, नैतिकता, चरित्र और सहयोग आदि की माप ली जाती है।
2  संचार संस्कृति और सामाजिक पर्यावरण को मापने वाले पैमाने जिनके द्वारा संस्थाओं, संस्थागत व्यवहार,संचारिक तथा सामाजिक स्थिति, आवास व्यवस्था, रहन सहन आदि की माप ली जाती है।
मीडिया या संचार के क्षेत्र में प्रमुख पैमाने निम्नलिखित है। -
1 अंक पैमाना- इस पैमाने में कुछ शब्द लिख दिए जाते हैं प्रत्येक शब्द का एक अंक होता है। सूचनादाता जिन शब्दोे को प्रसन्नता देने वाला समझता है उसके आगे सही का चिन्ह लगा देता हैं । जितने सही के निशान होते है, उनकी गिनती कर ली जाती है। इस प्रकार कुल योग ही प्राप्ताक होते है। इन अंको के आधार व्यक्ति के मनोभावों और प्रवृत्तियों का पता लग जाता है।
2 संचार रिक्तता मापन यंत्र - इस तरह के पैमानों द्वारा भिन्न भिन्न वर्गों अथवा व्यक्तिओं के मध्य पाए जाने वाले संचार रिक्तता का पता चल जाता है इस प्रकार के दो पैमाने प्रचलित है।
1 बोगार्डस का पैमाना
2 मीडियामितीय पैमाना
3 तीव्रता मापक यंत्र- व्यक्तिओं की रूचियों, अभिरूचियों, प्रवृत्तियों, मनावृत्तियों, मनाभावों आदि की तीव्रता और गहनता को मापने के लिए इन पैमानों का प्रयोग किया जाता है।
4 पदसूचक पैमाने - भिन्न- भिन्न पदों को तुलनाक्रम में रखकर जो अनुमापन पैमाना बनाया जाता है उसे की पदसूचक पैमाना कहते है। इन पैमाने  को निम्नलिखित प्रणालियों द्वारा निर्मित किया जाता है।
युग्म तुलना
हॉरोविज प्रणाली
थर्सटन प्रणाली
आंतरिक स्थिरता मापक पैमाने
मीडिया निर्देशांक
मनोवृत्तियों के माप की प्रणालियां
मीडिया संचार या समाज से जुड़े व्यक्ति अथवा समूह की मनावृत्ति दो प्रकार से मापी जा सकती है।
1 अभिमत सर्वेक्षण- व्यक्ति अथवा समूह की मनावृत्तियों के संदर्भ में उपयुक्त पैमाने द्वारा माप की सुविधा न होने के कारण प्रायः उनकी मौखिक राय के द्वारा ही उनकी प्रवृत्तियों का अनुमान किया जाता है। जब तक वास्तविक घटना न घटित हो तब तक शारीरिक व्यवहार संभव नही होता है और उसके बिना अनुमापन भी संभव नहीं होता । अतः यह कहा जा सकता है, कि व्यक्ति अथवा समूह की मनोवृत्ति का अनुमान उनके द्वारा मतानुसार ही किया जाएगा।
2 अनुमापन प्रणाली - व्यक्ति या समूह की मनावृत्ति उनके व्यवहार से परिलक्षित होती है। शरीर की भाषा से ही व्यक्ति की वास्तविक मनोवृत्ति की अभिव्यक्ति होती है। वास्तविक व्यवहार को मापने से ही मनावृत्ति का वास्तविक परिचय प्राप्त हो सकता है। मौखिक संचार के द्वारा व्यक्ति प्रायः अपने वास्तविक स्वरूप को प्रकट नहीं करता । अतः शरीर भाषा की माप ही मनोवृत्ति को समझने की सर्वश्रेष्ठ प्रणाली है।
1 अंक पैमाना - मीडिया या संचार शोध के लिए इसे सर्वाधिक सरल पैमाना माना जाता है। इसके माध्यम से व्यक्ति और समूह के व्यवहार का अनुमापन बहुत हद तक संभव है। वास्तव में अंक पैमाना के तहत मीडिया या संचार से संबंधित किसी भी विषय पर व्यक्ति और समूह की मनोवृत्ति जानने के लिए कुछ शब्द या स्थितियां लिख दी जाती है। इनमें से कुछ शब्द विषय का विरोध प्रकट करने वाले होते है। तथा कुछ उसके समर्थन का आभास देते है। उत्तरदाता जिन शब्दो को पसंद करता है उसके सामने सही और नापसंद वाले शब्दों को वहां से हटा देता है। हर सहमति के चिन्ह को 1 अंक दिया जाता है। इस प्रकार विषय के प्रति व्यक्ति की मनोवृत्ति की सीमा का अनुमान प्राप्तांको  के आधार पर किया जाता है। कभी- कभी परस्पर विरोधी तथा परस्पर सहमतिपूर्ण साथ साथ रखें जाते है। ऐसा इसलिए ताकि एक ही समय दोनो का उचित भार समझकर सूचनादाता मत प्रकट कर सके।
2 तीव्रता मापक पैमाना- यह पैमाना मनोवृत्ति मापने की एक अत्यत ही महत्वपूर्ण अनुमापन प्रणाली है। अर्थात इन पैमानों का उपयोग रूचियों और मान्यताओं की गहनता को मापने के लिए किया जाता है। व्यक्ति विषय के प्रति पूर्ण सहमत, थोड़ा बहुत सहमत, कम सहमत या असहमत हो सकता हैं। वह उदासीन और तटस्थ भी हो सकता है। व्यक्ति की मनोवृत्ति जानने के लिए यह महत्वपूर्ण है कि इन सभी सीमाओं का ज्ञान प्राप्त किया जाए। इसे अलग अलग शब्दों के द्वारा व्यक्त किया जा सकता है। यह तीव्रता जितने शब्दों से प्रकट की जाती है। उतने ही खंड पैमाने बन जाते हैं। यहां पांच खंडो के पैमाने का उदाहरण किया जा रहा है।
1 पूर्णतः पंसद 2 पसंद 3 अनिश्चित 4 नापसंद 5 पूर्णतः नापसंद ।
यहां तीव्रता मापने के लिए सात खंडों के भी पैमाने बनाए जा सकते हैं इस पैमाने के मध्य की स्थिति को शून्य का भार प्रदान किया जाता है। इसके दोनो ओर 1 2 3 आदि शब्दों का प्रयोग होता है। ये अंक धन अथवा ऋण में प्रदान किए जाते है। तीव्रता मापक पैमाने दो प्रकार के होते है। एक सम विस्तार और एक असम विस्तार पैमाना। उपरोक्त पांच खंडों वाला पैमाना समय विस्तार पैमाना है क्योंकि इसमें भिन्न भिन्न खंडों का विस्तार समान है तथा तटस्थ बिंदु का अंक शून्य है । असमान विस्तार वाले पैमाने में भार एक क्रमानुसार होता है, जिसमें माप शून्य से आरंभ होकर आगे बढ़ती जाती है। यहा कोई जरूरी नहीं कि दोनों खंडों के बीच का विस्तार समान हो । इन दोनेां प्रकार के पैमानों को दो विद्वानों ने अलग अलग तरीके से वर्णित किया है।
1 थर्सटन का समय विस्तार पैमाना-
 यह पैमाना सबसे पहले एल एल थर्सटन द्वारा किसी समूह की राय जानने के लिए किया गया था। यह पैमाना आवृत्ति बंटन के रूप में होता है। इसकी आधार रेखा प्रवृत्तियो के पूर्ण विस्तार को समान खंडों में प्रकट करती है। सम विस्तार प्रणाली में इसके एक छोर पर धनात्मक अधिकतम भार बिंदु रहता है। जबकि दूसरे छोर पर ऋणात्मक अधिकतम भार बिंदु रहता है। यहां शून्य भार मध्य बिंदु पर रहता है।
2 लाइकर्ट का पैमाना
यह पैमाना भी थर्सटन के पैमाने की तरह ही है, किन्तु उससे अधिक सरल और सुबोध है। लाइकर्ट के तीव्रता मापक पैमाने को तीव्रताओं के योग का पैमाना भी कहा जाता है।
इस प्रणाली में अंक प्रदान करने की एक अन्य विधि को लगाया जाता है जिसे सिगमा विधि कहा जाता है। इसका उपयोग एक गणितीय तालिका के माध्यम से किया जाता है। भिन्न भिन्न विवरणों को अनेक प्रकार के व्यक्तिाओं में बांटकर उनमें पांच खंडों में से किसी एक खंड पर निशान लगाने को कहा जाता है। बाद में हर एक खंड का योग प्रतिशत में निकाल लिया जाता है। हर प्रतिशत का सिगमा मूल्य भी निकाल लिया जाता है।
पदसूचक पैमाना- यह अनुमापन प्रणाली का एक अपरिहार्य पैमाना है। यह तीव्रता मापन पैमाने के सदृश्य होता है। इसमें किसी विशेष तत्व का सभी क्रमों में स्थान निर्धारित किया जाता है। इस पैमाने के जो दो प्रमुख पैमाने है वे इस प्रकार है।
1 तुलनात्मक युग्म - इस विधि के अन्तर्गत व्यवसायों के जोड़े लिखकर सूचनादाता को दिए जाते है। हर जोड़े में से एक पर सहमति का निशान लगवाया जाता है। प्रत्येक व्यवसाय को मिले अंको या प्राथमिकताओं का योग निकाल लिया जाता है। इन सभी के माध्य को पैमाने का मूल्य समझा जाता है।
3 हॉरोविज प्रणाली - हॉरोविज ने जातीय पक्षपात का अध्ययन करने के लिए 12 चित्रों का चयन किया। इसमें से 8 नीग्रो और 4 गोरे बच्चों के थे। ये चित्र स्कूली बच्चों को दिये गये । इन बच्चों को चित्रों को प्राथमिकता के आधार पर उपर से नीचे क्रमानुसार लगाने को कहा गया । उपर से नीचे चित्रों को क्रम से 1 2 3 4 5 आदि अंक दिए गए । हॉरोविज ने इन स्कूली बच्चों में बालकों को भिन्न भिन्न स्थितियों में उन्ही चित्रों में से साथी चुनने का कहा। इस प्रकार प्राथमिकता के प्रतिशत के आधार पर पक्ष या विपक्ष का फैसला लिया गया ।
4 संचार रिक्तता माप पैमाना- इर समाज या समुदाय में  संचार रिक्तता के कारण वर्ग विद्वेष की भावना किसी न किसी रूप में पाई जाती है। प्रायः व्यक्ति अतीत के अनुभवों और आस पास के पर्यावरण से प्रभावित होकर किसी वर्ग के प्रति सकारात्मक नजरिया रखता है। दोनो वर्गो के प्रति द्वेष और निकटता की भावना भी अलग अलग मात्रा में होती है। इस प्रकार की संचार रिक्तता को मापने के लिए संचार रिक्तता पैमाना या सामाजिक दूरी पैमाना का प्रयोग किया जाता है। संचार रिक्तता या सामाजिक दूरी मापने के लिए निम्नलिखित दो प्रकार के पैमाने अधिक प्रचलित है।
1 बोगार्डस का पैमाना- बोगार्डस ने संचार रिक्तता या सामाजिक दूरी को इंगित करने वाले भिन्न- भिन्न संबंधों को चयन किया । इन सभी संबंधों को सात ऐसी श्रेणियों में विभाजित किया गया जो बढ़ती हुई संचार रिक्तता या समाजिक दूरी प्रकट करती थी। यह काम सौ जजों से कराया गया। बाद में ये अनुसूचियों 1725 व्यक्तिओं को दी गयीं। इनमें दक्षिण की ओर प्रजातियों  के नाम लिखे गये। उत्तर की ओर संबंधों या दूरियों की श्रेणियां रखी गई । जैसे व्यवसाय साथी, जीवन साथी, क्लब, साथी आदि बनाने की स्वीकृति। इन सभी व्यक्तिओं को श्रेणियों के सामने चिन्ह लगाने का निर्देश दिया गया । हर श्रेणी के आधार पर प्रजातियों के प्रति मनोवृत्तियों का योग निकालकर प्रतिशत में परिवर्तित किया गया। इस प्रकार भिन्न भिन्न के प्रति संचार रिक्तता या सामाजिक दूरी का औसत निकाला गया । लेकिन इस विधि को कम विश्वसनीय समझा जाता है।
मीडियामितीय पैमाना- इस विधि का प्रयोग भी प्रत्यक्ष- परोक्ष रूप से किया जाने लगा है। यह पैमाना संस्थागत अथवा सामुदायिक अथवा सामूहिक मनोवृत्तियों को मापने में उपयोग किया जाता है। समूह में पारस्परिक संचार एवं संबंधों की माप में यह पैमाना अधिक प्रासंगिक, लाभकारी, उपयोगी और सहायक साबित होता है।
मीडिया या संचार शोध में सामुदायिक, संस्थागत व्यवहार का निम्न लिखित प्रणालियों द्वारा मापा जा सकता है।
1 मीडियामितीय पैमाना - इस प्रणाली की निम्न लिखित विशेषता होती है।
अ मीडियामितीय एक अनुमापन विधि है, जिसके द्वारा सामूहिक या सामुदायिक स्वीकृति अथवा अस्वीकृति प्रेम अथवा घृणा की सीमा माप ली जाती है।
ब  यह सामुदायिक, संस्थागत, या सामूहिक संबंधों, मीडियाई या संचारिक संरचना तथा स्थिति के अध्ययन से संबंधित है।
स इसके द्वारा सामुदायिक,संस्थागत, सामाजिक तथा समूह सांचारिक व्यवहार की प्रस्तुति रेखाचित्रों अथवा सरल बिंदु रेखाओं द्वारा की जाती है।
इस पैमाने के निर्माण में संस्था का चुनाव माप के पहलू संबंधित तथ्यों का चुनाव एवं भार प्रदानीकरण आदि जैसी महत्वपूर्ण प्रक्रियाओं का अपनाया जाता है। एक अच्छी मीडियामितीय पैमाने में विश्वसनीयता, वैधता, सरलता, व्यापकता, व्यावहारिकता, आदर्शानुकूलता, और उचित भार की मौजुदगी रहती है।
2 मीडिया की बिंदु रेखीय विधि- मीडिया का बिंदु रेखीय या ग्राफ द्वारा चित्रण पारस्परिक आकर्षण अथवा विकर्षण को प्रकट करने का सरल मीडियामितीय साधन है।
3 मीडिया निर्देशांक- जब मीडिया या संचार से संबंधित एक से अधिक सम्मिलित तथ्यों का तुलनात्मक अध्ययन करना होता है, तो मीडिया निर्देशांको का प्रयोग किया जाता है। सांचरिक अथवा संस्थागत व्यवहार को मापने के लिए मीडियामितीय पैमानों का अधिक परिमार्जित और परिष्कृत रूप निर्देशांक है। इसके द्वारा मीडिया या संचार से संबंधित तथ्यों की माप की इकाई में की जा सकती है तथा एक ही दृष्टि में उनके बारे में जानकारी हासिल की जा सकती है।
अनिल अत्री ........

Hypothesis उपकल्पना / प्राकल्पना


Hypothesis
समाजिक घटनाओं के अध्ययन में उपकल्पना का महत्वपूर्ण स्थान होता है। इसका निर्माण प्रयोग और उपादेयता वैज्ञानिक पद्धति का एक महत्वपूर्ण चरण होता है। प्राकल्पना के अभाव में विषय की दिशा और उसका क्षेत्र अनिश्चित रहता है जिसके कारण शोधकर्ता दिशाविहीन हो जाता है। इसलिए शोधकर्ता के लिए यह आवश्यक होता है कि वह किसी अन्य अपरिचित शोध कार्य में यूं ही कदम ना रखें बल्कि अपनी कल्पना, अनुभव या किसी अन्य स्त्रोतों के आधार पर एक तर्क वाक्य का निर्माण कर ले जिसे शोध के दौरान परिक्षित किया जाता है।  पी वी यंग ने कामचलाउ प्राकल्पना के निर्माण को वैज्ञानिक पद्धति का पहला चरण बताया है। गुड्डे और हॉट के मुताबिक सामाजिक शोध में एक अच्छी प्राकल्पना का निर्माण का अर्थ शोध के आधे कार्य का पूरा हो जाना माना जाता है।
प्राकल्पना का शाब्दिक अर्थ - प्राकल्पना अंग्रेजी के शब्द हाइपोथिसिस का हिंदी अनुवाद है। यह शब्द ग्रीक भाषा के दो शब्दों से मिलकर बनता है। इसका पहला शब्द ीलचव है अर्थात इमसवू है जिसका अर्थ होता हैं नीचे तथा दूसरा शब्द जीमेपे अर्थात जीमवतल है जिसका अर्थ होता है विचार या सिद्धांत। इस प्रकार इसका पूर्ण अर्थ हुआ इमसवू जीमवतल अर्थात सिद्धांंत से नीचे या सिद्धांत का पूर्व कथन। प्राकल्पना में भी प्राक् का अर्थ पूर्व और कल्पना का अर्थ विचार यानि पूर्व का विचार या सिद्धांत ही होता है। सरल शब्दों में प्राकल्पना का अर्थ होता है एक ऐसा विचार या सिद्धांत जिसे शोधकर्ता अध्ययन के लक्ष्य के रूप में रखता है और उसकी जांच करता है।
अर्थ - प्राकल्पना को सामान्यतः एक कामचलाउ लोक सामान्यीकरण माना जाता है जिसकी शोध के दौरान परीक्षा की जाती है। वैज्ञानिक आधारों पर एक प्राकल्पनाओं को दो से अधिक चरों के मध्य संबंध का अनुमानित विवरण कहा जाता है। प्रारंभिक जानकारी के आधार पर किया गया पूर्वानुमान जिसके आधार पर संभावित शोध को एक निश्चित दिशा प्रदान की जा सके, प्राकल्पना कहलाता है और भी स्पष्ट रूप में यह कहा जा सकता है कि एक प्राकल्पना दो या दो से अधिक चरों के बीच होने वाले संबंध का अनुभावात्मक रूप से परीक्षा करने योग्य कथन है। वैज्ञानिकों ने प्राकल्पना को एक अस्थायी अनुमान, कामचलाउ सामान्यीकरण, कलात्मक विचार, पूर्वानुमान और अनुमानात्मक कथन बताया है। प्राकल्पना एक प्रकार का सर्वोत्तम अनुमान होता है जो कुछ शर्ते रखता है जिनके परिक्षण की आवश्यकता होती है।

प्राकल्पना की परिभाषा -

प्राकल्पना को विभिन्न विद्वानो ने अपने अपने दृष्टिकोणों से परिभाषित किया है जिनमें से कुछ प्रमुख परिभाषाए निम्नलिखित है।
 लुण्ड बर्ग के अनुसार प्राकल्पना एक सामयिक अथवा कामचलाउ सामान्यीकरण या निष्र्कष है। जिसकी सत्यता की परीक्षा बाकी हैं। आरंभिक स्तर पर प्राकल्पना कोई भी अनुमान, कल्पनात्मक विचार, सहज ज्ञान या और कुछ हो सकता हैंै, जो कि क्रिया या शोध का आधार बन जाए ।
बोगार्डस के मुताबिक प्राकल्पना परीक्षण के लिए प्रस्तुत की गई प्र्रस्थापना है।
मान के अनुसार प्राकल्पना एक अस्थायी अनुमान है।
बैली के अनुसार एक प्राकल्पना एक ऐसी प्रस्थापना है जिसे परीक्षण के रूप में रखा जाता है। और जो दो या दो से अधिक परिवत्र्यो के विशिष्ट संबंधों के बारे में भविष्यवाणी करती है।
डोब्रिनर के मुताबिक प्राकल्पनाएं ऐसे अनुमान है जो यह बताते हैं कि विभिन्न तत्व अथवा परिवत्र्य किस प्रकार अन्र्त संबंधित है।
विशेषताएं-
अ. गुड्डे और हॉट ने प्राकल्पनाओं की निम्नलिखित विशेषताएं बताई है।
1 स्पष्टता - प्राकल्पनाएं अवधारणाओं के दृष्टिकोण से स्पष्ट होना चाहिए। किसी भी स्तर पर अस्पष्टता वैज्ञानिक सिद्धांत के प्रतिकूल होती है।
2 अनुभव सिद्धता - अध्ययन में प्राकल्पना ऐसी होनी चाहिए जिसकी तथ्यों द्वारा जांच की जा सके। प्राकल्पना अगर आर्दशों को स्पष्ट करने वाली होगी तो उसकी सत्यता की परीक्षा आसानी से की जा सकती है। प्राकल्पना ऐसे तथ्यों, कारकों एवं चरों से संबंधित होना चाहिए जो समाज या अध्ययन क्षेत्र में जाकर एकत्रित किए जा सकें साथ ही उनकी विश्वसनीयता की जांच भी की जा सके।
3 विशिष्टता-  सामान्य प्राकल्पनाओं द्वारा सही और सटीक निष्कर्ष पर पहुंचना संभव नहीं इसलिए प्राकल्पनाओं को विशिष्ट और उपयोगी होना चाहिए। प्राकल्पना अध्ययन विषय के किसी विशेष पहलु से जुड़ी होना चाहिए। प्राकल्पना का सीमित, विशिष्ट और निश्चित पक्ष से संबंधित होना चाहिए।
4 उपलब्ध प्रविधियों से संबंद्ध- प्राकल्पना एक प्रस्थापना होती है। जो तथ्यों का परस्पर कारण प्रभाव संबंध बताती है और जिनकी जांच करना अभी बाकी है। जो कि वैज्ञानिक प्रविधियों द्वारा की जाती है। प्राकल्पना का निर्माण इस बात को ध्यान में रखकर किया जाना चाहिए कि उसकी सत्यता की जांच उपलब्ध प्रविधियों के द्वारा की जा सके।
5 समूह से संबंधित होना- सिद्धांतों से संबंधित प्राकल्पनाओं को सिद्धांत के समूह से संबंधित होना चाहिए।
6 सरलता- किसी भी प्राकल्पना में सरलता बनाए रखने के लिए सीमित कारणों का अध्ययन करना चाहिए। अनावश्यक रूप से अधिक कारकों को शोध में शामिल नहीं करना चााहिए। पीवी यंग के अनुसार सरलता एक तेज धार वाला यंत्र है जो व्यर्थ की प्राकल्पना और विवेचना को  काट भी सकता है।
7 मार्गदर्शन के लिए भी प्र्राकल्पना उपयोगी होना चाहिए।
8 प्राकल्पना किसी विषय के संबंध में अस्थायी हल देने का साधन हैं
9 प्राकल्पना उपलब्ध पद्धतियों और साधनों से संबंधित होना चाहिए।
10 परिकल्पना में अतिशोयक्तिपूर्ण भाषा का उपयोग नहीं किया जाना चाहिए।
11 प्रयोगसिद्धता का गुण होना चाहिए।
12 प्राकल्पना व्यावहारिक और यर्थाथ पर आधारित होना चाहिए।
13 प्राकल्पना को पूर्व में निर्मित सिद्धातों पर खरा उतरना चाहिए।
14 प्राकल्पना समस्या से सीधे संबंधित होना चााहिए।
15 प्राकल्पना और उसके तहत एकत्र किए गए तत्व उपयोगी होना चाहिए।
प्राकल्पना का विकास-
किसी भी वस्तु या अवधारणा का विकास एकाएक न होकर कुछ चरणों और प्रक्रियाओं से गुजर कर होता है। प्राकल्पना भी इसका अपवाद हैंं। एक विद्वान के मुताबिक प्राकल्पनाओं का विकास करते समय इस बात को ध्यान में रखा जाना चाहिए कि प्राकल्पनाओं में लचीलापन बना रहे इनके विभिन्न विकल्पोें को स्वीकार और अपवादांें को स्पष्ट किया जाए । इस बात का खयाल रखा जाए कि अधिकतर सामाजिक परिस्थितियों में हम उन कारकों का सफलतापूर्वक पता लगा सकते हैं। जिनकी हमें तलाश है।
आमतौर पर प्राकल्पना के विकास की सामान्य प्रक्रिया निम्नलिखित चरणों में पूरी होती है।
1  सभी विकल्पीय कार्यो को ज्ञात किया जाना चाहिए ।
2  शोध से संबंधित महत्वपूर्ण चरों का चयन किया जाना चाहिए।
3  प्राकल्पना से संबंधित आनुभविक तथ्यों का संकलन किया जाना चाहिए।
4  प्राकल्पना की स्थापना की जाना चाहिए।
5  प्राकल्पनाओं के आशय का ज्ञान होना चाहिए ।
6  व्यावहारिक प्राकल्पनाओं का निर्माण करना चाहिए।
7  व्यावहारिक प्राकल्पनाओं के परीक्षण के लिए परिस्थितियों प्रविधियों एवं उपकरणों आदि का उल्लेख किया जाना चाहिए।
8  प्राकल्पना की जांच के लिए उपयुक्त माप का चयन किया जाना चाहिए।
9  मापों के प्रयोग से संबंधित मान्यताओं को निर्धारित किया जाना चाहिए।
10  प्राकल्पनाओं के उपयुक्त तथ्यों को एकत्र करके सत्यता की जांच की जानी चाहिए।
  उपर्युक्त चरणों से होकर ही प्राकल्पना का विकास होता है।
प्राकल्पना के प्रकार-
हेष ने परिकल्पना को दो भागों में विभक्त किया है।
1 सरल प्राकल्पना- जब किन्ही दो चरों में परस्पर सहसंबंधों का अध्ययन और परीक्षण किया जाता है इसे सरल प्राकल्पना कहा जाता है।
2 जटिल प्राकल्पना- इस तरह की प्राकल्पना में एक से अधिक चरों के सहसंबंधों का अध्ययन किया जाता है।
गुड्डे और हॉट ने प्राकल्पना को तीन प्रकारों में विभाजित किया है।
1 आनुभाविक एकरूपता से संबंधित प्राकल्पनाएं- इसके अन्र्तगत वे प्राकल्पनाएं आती हैं जो अनुभवात्मक समरूपता के अस्तित्व की विवेचना करती है। इस स्तर की प्राकल्पनाएं सामान्य तथा सामान्य ज्ञान पर आधारित कथनो की वैज्ञानिक परी़क्षा करती है।
2 जटिल आदर्श प्रारूप से संबंधित प्रकल्पनाएं-  इन प्राकल्पनाओं का उद्देश्य प्रचलित तार्किक और अनुभवात्मक एकरूपताओं के संबंधों का परीक्षण करने के लिए किया जाता है। यह प्राकल्पनाएं विभिन्न कारको में तार्किक अन्र्तसंबंध स्थापित करने के उद्देश्य से बनाई जाती है। यथार्थ में अधिक जटिल शोध के क्षेत्र में फिर से शोध करने के लिए उपकरणों और समस्याओं का निर्माण करना इस प्रकार की प्राकल्पनाओं का महत्वपूर्ण कार्य है।
3 विश्लेषणात्मक चरों से संबधित प्राकल्पनाएं- इस प्रकार की प्राकल्पनाएं चरों के तार्किक विश्लेषण के अलावा विभिन्न चरों में आपसी गुणों का भी विश्लेषण करती है। इनका उद्देश्य प्रभावों का तार्किक आधार तलाश करना भी होता है। विश्लेषणात्मक चरों से संबंधित प्राकल्पनाएं बहुत अधिक अमूर्त प्रकृति की होती हैं। इनमें चर का अन्य चरों पर क्या प्रभाव होता है। तथा चरों का आपस में क्या प्रभाव होता हैं इसका गहनता से अध्ययन किया जाता है। इनका प्रयोग विशेष रूप से प्रयोगात्मक शोधों के लिए किया जाता है। ग्रामीण विकास कार्यक्रम, जाति व्यवस्था, नेतृत्व और निर्धनता आदि ऐसी समस्याए है जिनका अध्ययन अनेक चरों से संबंधित होता है। इसलिए इसमें विश्लेषणात्मक चरों से संबंधित प्राकल्पनाओं का प्रयोग किया जाता है।
एम एच गोपाल ने प्राकल्पनाओं को दो भागों में बांटा है।
1 मौलिक प्राकल्पना - इसमें निम्न स्तरीय विचारधाराएं होती है। जो ज्यादातर संकलित की जाने वाली सामग्री को बताती है।
2 विशुद्व प्राकल्पनाएं- ये वह प्राकल्पनाएं है जो वास्तविक रूप से अधिक महत्वपूर्ण होती है। इन प्राकल्पनाओं को निम्न उपभागों में बांटा गया है।
ं सामान्य स्तरीय प्राकल्पनाएं
 जटिल आर्दश प्राकल्पनाएं
 जटिलता अन्र्तसंबंधित चर प्राकल्पनाएं।
मैक गुइगन ने इसे दो भागों में विभक्त किया है।
1 सार्वभौमिक प्राकल्पनाएं- सार्वभौमिक कल्पनाएं वो है, जिनका संबंध अध्ययन किए जाने वाले सभी चरों से सभी समय एवं सभी स्थानों पर रहता है।

2 अस्तित्वात्मक प्राकल्पना- जो प्राकल्पना चरों के अस्तित्व को उचित साबित करती है, उसे आस्तित्वात्मक प्राकल्पना कहते हैं...अनिल अत्री ..............


Research Meaning , Types Etc.. शोध का अर्थ


शोध का अर्थ

प्रकृति  ने  संसार को अनेक चमत्कारों  से नवाजा हैं। कुछ चमत्कारों की खोज भी एक लंबे अंतराल के शोध के बाद ही संभव हो सकी थी। यही कारण है कि किसी भी सत्य की खोज और उसकी पुष्टी के लिए शोध का होना अनिवार्य होता है। मानव की जिज्ञासु प्रवृत्ति ने ही शोध प्रक्रिया को जन्म दिया । किसी भी सत्य को निकटता से जानने के लिए शोध एक महत्वपूर्ण प्रक्रिया होती है। समय- समय पर विभिन्न विषयों की खोज और उनके अध्ययन और निष्कर्षो की विश्वसनीयता और प्रमाणिकता भी शोध की मदद से ही संभव हो पाती है। जैसे जैसे समय बीत रहा हैं वैसे वैसे मानव की समस्या भी विकट होती जा रही है। हर दिन एक नई समस्या से उसे दो चार होना पड़ता है। ऐसे में शोध की महत्ता स्वतः ही पैदा हो जाती है। हालांकि मानव की सोच विविधता वाली होती है और उसकी रूचि, प्रकृति, व्यवहार, स्वभाव और योग्यता भिन्न - भिन्न होती है। इस लिहाज से अनेक जटिलताएं भी पैदा हो जाती है। इस लिहाज से मानवीय व्यवहारों की अनिश्चित प्रकृति के कारण जब हम उसका व्यवस्थित ढंग से अध्ययन कर किसी निष्कर्ष पर आना चाहते हैं तो वहां पर हमें शोध का प्रयोग करना होगा। इस तरह सरल शब्दों में कहें तो सत्य की खोज के लिए व्यवस्थित प्रयत्न करना या प्राप्त ज्ञान की परीक्षा के लिए व्यवस्थित प्रयत्न भी शोध कहलाता है। तथ्यों कर अवलोकन करके कार्य- कारण संबंध ज्ञात करना अनुसंधान की प्रमुख प्रक्रिया है।
शोध का आशय
     
शोध शब्द अंग्रेजी के रिसर्च का हिन्दी अनुवाद है। यह दो शब्द re और search से मिलकर बना है। re का अर्थ होता है पुनः और search का अर्थ होता है खोज। इस तरह यह दोनों शब्दों का अर्थ होगा पुनः खोज । इसलिए हम इसके अर्थ को स्पष्ट करें तो इसका तात्पर्य होगा पुनः या बार- बार होने वाली खोज । किसी भी विषय या समस्या की प्रमाणिकता को बनाए रखने के लिए बार बार खोज की जाती है।


शोध की परिभाषा
रैडमैन और मोरी ने अपनी किताब  “The Romance of Research” में शोध का अर्थ स्पष्ट करते हुए लिखा है, कि नवीन ज्ञान की प्राप्ति के व्यवस्थित प्रयत्न को हम शोध कहते हैं।
एडवांस्ड लर्नर डिक्शनरी आॅफ करेंट इंग्लिश के अनुसार- किसी भी ज्ञान की शाखा में नवीन तथ्यों की खोज के लिए सावधानीपूर्वक किए गए अन्वेषण या जांच- पड़ताल को शोध की संज्ञा दी जाती है।
स्पार और स्वेन्सन ने शोध को परिभाषित करते हुए अपनी पुस्तक में लिखा है कि कोई भी विद्वतापूर्ण शोध ही सत्य के लिए, तथ्यों के लिए, निश्चितताओं के लिए अन्चेषण है।


वहीं लुण्डबर्ग ने शोध को परिभाषित करते हुए लिखा है, कि अवलोकित सामग्री का संभावित वर्गीकरण, साधारणीकरण एवं सत्यापन करते हुए पर्याप्त कर्म विषयक और व्यवस्थित पद्वति है।


उपरोक्त परिभाषा के आधार पर कहा जा सकता है कि नवीन ज्ञान की खोज की दिशा में दिए गए व्यवस्थित एवं क्रमबद्व प्रयास शोध है। शोध का अंतिम उद्ेदश्य सिद्धांतों  का निर्माण करना होता है। मनुष्य के जीवन में आने वाली समस्याओं के निदान में भी शोध ही आगे आता है। शोध विज्ञान और वैज्ञानिक पद्धति पर आधारित होता है। इसलिए इस पर आधारित ज्ञान भी वस्तुपरक होता है।


शोध के प्रकार
‘शोध का प्रमुख लक्ष्य वैज्ञानिक पद्वति के प्रयोग द्वारा प्रश्नों के उत्तर खोजना है इसका उद्देश्य अध्ययनरत समस्या के अंदर छुपी हुई यर्थाथता का पता लगाना या उस सबकी खोज करना है जिसकी जानकारी समस्या के बारे में नहीं है। वैसे प्रत्येक शोध के अपने विशेष लक्ष्य होते है फिर भी सैल्टिज, जहोदा,सी आर कोठारी आदि ने सामाजिक शोध को निम्नलिखित प्रकारों में विभाजित किया हैं।
1 किसी घटना के बारे में जानकारी प्राप्त करना या इसके बारे में नवीन ज्ञान प्राप्त करना- इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए की जाने वाली शोध को अन्वेषणात्मक अथवा निरूपणात्मक शोध कहते है।
2 किसी व्यक्ति परिस्थिति या समूह की विशेषता का सही चित्रण करने के लिए की जाने वाली शोध को वर्णनात्मक शोध कहते है।
3 किसी वस्तु या घटना के घटित होने की आवृत्ति निर्धारित करना या किसी अन्य वस्तु या घटना के साथ संबंध स्थापित करने के लिए निदानात्मक शोध उपयोग में लाई जाती है।
4 विभिन्न चरो में कार्य कारण संबंधों वाली उपकल्पनाओं का परीक्षण करने के लिए उपकल्पना परीक्षण अनुसंधान या प्रायोगिक शोध उपयोग में लाई जाती है।
         शोध की उपरोक्त श्रेणियों के आधार पर सामाजिक शोध को मुख्यतः निम्न रूपों में विभाजित किया जा सकता है।
1 मौलिक या विशुद्व शोध - शोध के इस प्रकार में सामाजिक जीवन या घटना के संबंध में मौलिक सिद्वांतों और नियमों का अनुसंधान किया जाता है । इसका उद्वेश्य नए ज्ञान की प्राप्ति और बढ़ोत्तरी के साथ पुराने ज्ञान की पुनः परीक्षा द्वारा उसका शुद्वीकरण होता है इस प्रकार की खोज में नए तथ्यों और घटनाओं का अध्ययन किया जाता है। मौलिक शोध के अन्र्तगत नए सिद्वांतों और नियमों की खोज नवीन परिस्थितियों और समस्याओं के उत्पन्न होने पर की जाती है। इसका कारण यह है कि इन नवीन सिद्धांतों का वर्तमान परिवर्तित परिस्थितियों के साथ ज्यादा से ज्यादा मेल बैठ जाए और हम उनके संबंध में अपने नवीनतम ज्ञान के सहारे मौजुद परिस्थितियों की चुनौती का सामना अधिक सफलता पूर्वक कर सकें। शोधकर्ता अपने अनुसंधान के द्वारा जो सामाजिक शोध ज्ञान की प्राप्ति परिमार्जन और परिवर्धन को अपना लक्ष्य मानता है उसे मौलिक शोध कहते है।
2 व्यावहारिक शोध- पी वी यंग के अनुसार खोज का एक निश्चित संबंध लोगों की प्राथमिक आवश्यकताओं और कल्याण से होता है। सिद्धांत और व्यवहार आगे चलकर बहुधा एक दूसरे में मिल जाते है इसी मान्यता के आधार पर सामाजिक शोध के दूसरे प्रकार को व्यावहारिक शोध कहा जाता है। इस प्रकार के व्यावहारिक शोध का संबंध सामाजिक जीवन के व्यावहारिक पक्ष से होता है और वह सामाजिक समस्या के संबंध में ही नहीं बल्कि सामाजिक नियोजन, सामाजिक अधिनियम, स्वास्थ्य रक्षा संबंधी नियम,धर्म, शिक्षा, न्यायालय, मनोरंजन आदि विषयों के संबंध में भी अनुसंधान करता है और इनके संबंध में कारण सहित व्याख्या और ज्ञान से लोगो को रूबरू करवाता है। इसका तात्र्पय यह नहीं है कि व्यावहारिक शोध का कोई संबंध समाज सुधार से,सामाजिक बुराईयों के उपचार से, सामाजिक अधिनियमों को बनाने या सामाजिक नियमों को व्यावहारिक रूप में प्रस्तुत करने से होता है। वह स्वंय यह सब कुछ नही करता है। व्यावहारिक शोध का काम केवल व्यावहारिक जीवन से संबंध विषयों तथा समस्याओं के संबंध में सही ज्ञान देना है। व्यावहारिक शोध हमारे जीवन में आने जाने वाली समस्याओं  और अन्य घटनाओं पर नियंत्रण प्राप्त करने या उनका अन्य उपचार प्राप्त करने के लिए आवश्यक सिद्धांतों के विषय में हमारी चिंतन प्रक्रिया को उभार सकता हैं । सामान्यतः यह देखा गया है कि आश्र्चयजनक प्रयोगसिद्ध व्यावहारिक खोज की व्याख्या या विश्लेषण करने के दौरान शोधकर्ता ऐसे व्यावहारिक सुधारों को प्रस्तुत करता है जो कि अनेक सामाजिक समस्याओं के उपचार में सहायक साबित होते है।
3 क्रियात्मक शोघ- जब सामाजिक शोध अध्ययन के निष्र्कषो को क्रियात्मक रूप देने की किसी भावी योजना से संबंध होता है तो उसे क्रियात्मक शोध कहा जाता है। गुड्डे तथा हॉट के  अनुसार क्रियात्मक शोध उस कार्यक्रम का अंश होता हैं जिसका लक्ष्य उपस्थित अवस्थाओं का परिवर्तित करना होता है। चाहे वो गंदी बस्ती की अवस्था हो या किसी संगठन की प्रभावशिलता हो । इस शोध में निम्न बातों का ध्यान रखना चाहिए।
a. अध्ययन के समय घटना या समस्या के वास्तविक क्रिया पक्ष पर ध्यान - इसका तात्पर्य है कि जिन घटना का अध्ययन शोधकर्ता कर रहा है। उसमें शामिल मानवीय क्रियाओं, कारणों, आधारों और नियमों के प्रति वह अत्यधिक सचेत होता है। अगर वह घरेलू हिंसा का अध्ययन कर रहा है तो वह यह जानने का प्रयास करेगा कि परिवार में पुरूष महिलाओं के प्रति कैसा व्यवहार करते है और उसका कारण और आधार क्या है।
b.समस्या और घटना के संबंध में ज्ञान - शोधकर्ता का विषय से संबंधित घटना के बारे में जानकारी होना चाहिए ऐसा न होने की स्थिति में उस घटना में मौजुद किसी भी क्रियात्मक पक्ष का अनुसंधान करना संभव नही होगा ।
c.  सहयोग की प्राप्ति - शोधकर्ता को निरंतर इस बात का प्रयत्न करना होता है कि उसे अपने कार्य में कम से कम विरोध का सामना करना पड़े। क्र्रियात्मक शोध का पहला उद्देश्य विघमान समस्याओं में परिवर्तन लाना होता है । इस प्रयत्न को करते समय संभव है कि समाज के लोगों के स्वार्थ को ठेस लगे। इसलिए शोधकर्ता को इन सब बातों का ध्यान रखना चाहिए ताकि उसे हर संभव मदद मिल सके ।
d. रिपोर्ट को आरंभ में ही अंतिम रूप न देना- क्रियात्मक शोध की रिपार्ट को आरंभ में ही अंतिम रूप में प्रस्तुत नही करना चाहिए। पहले एक अंतरिम रिपोर्ट को प्रस्तुत करना चाहिए जिससे उसके प्रभावित होनो वाले व्यक्तिओं की प्रतिक्रिया को जाना जा सके । उन प्रतिक्रियाओं के आधार पर अंतिम रिपोर्ट में आवश्यक सुधार करने की गुंजाईश हमेशा रहनी चाहिए।
शोध अभिकल्प का महत्व एवं विशेषताएं -
1 इसका संबंध सामाजिक शोधों से होता है। अर्थात सामाजिक शोधों के दौरान शोध कार्य करने के लिए सामाजिक शोधों का निर्माण किया जाता है।
2  यह शोधकर्ता को शोध की एक निश्चित दशा का बोध कराता है। इसकी एक रूपरेखा होती है जिसका निमार्ण शोधकार्य करने के पूर्व किया जाता है। यह एक दिग्दर्शक की तरह होता है।
3  इसके द्वारा सामाजिक घटना का सरलीकरण किया जाता है।
4  यह नियत्रंण का कार्य करती है। यह शोध प्रक्रिया में आगे की परिस्थितियों को नियंत्रित करती है।
5  इस प्रक्रिया में कम खर्चा होता है। यह मानवीय श्रम को कम करके समय और लागत को भी कम करती है।
6 यह बाधा निवारक का काम करती है।
Problem in social research
सामाजिक शोध में समस्या का चयन और उसका प्रतिपादन अथवा पहचान सामाजिक अनुसंधान के  सफल संचालन के लिए अत्यंत आवश्यक माना जाता है। ए आइन्सटीन तथा एन इन्फील्ड ने कहा कि समस्या का प्रतिपादन प्रायः इसके समाधान से अधिक आवश्यक हैं। अतः सामाजिक शोध की प्रक्रिया का प्रथम चरण शोध समस्या के चयन तथा उसके प्रतिपादन को माना जाता है।
समस्या का चयन और उसकी परिभाषा-  सामाजिक शोध के अन्र्तगत अनेक समस्याओं का समावेश होता है। इस लिहाज से नवीन शोधकर्ता के लिए समस्या की संर्पूण चयन विधि से पूर्णतः परिचित होना महत्वपूर्ण स्थान रखता है। गुड्डे और स्केट ने अनुभवी वैज्ञानिक की नजर से समस्याओं के छूटने की घटना का उल्लेख अपनी किताब में किया है। उन्होने बताया कि बेल टेलीफोन के अविष्कार के संबंध पढ़कर एक सप्ताह तक सो नहीं सके उन्होने कहा कि यह समस्या उनके समाने एक वर्ष में कई बार आई किंतु वे उसे देखने में असमर्थ रहें।
इस लिहाज से समस्या के चयन के लिए पूरी सर्तकता बरतने की आवश्यकता होती है। यह जरूरी नहीं की शोध के लिए चुना गया विषय पूर्णतः तार्किक हो, समस्या के चयन में शोधकर्ता पर उसका व्यक्तित्व और पर्यावरण दोनों महत्वपूर्ण प्रभाव डालते है। शोधकर्ता समाज से सीधे रूप से जुड़ा होता है। उसके अपने विचार, विश्वास, मूल्य, मनोवृत्तियां ,व्यवहार आदि होेते हैं। शोधकार्य के लिए लगन स्थिरता और तारतम्यता की आवश्यकता होती है। अतः शोध के लिए चुनी गई समस्या आदि शोध कर्ता के व्यक्तित्व संबंधी विशेषताओं के अनुकूल होना अधिक उपयुक्त माना जाता है।
समस्या के चुनाव के दौरान शोधकर्ता के अपने विचार उस पर काफी प्रभाव डालते है। इस लिहाज से ये कहा जा सकता है कि शोध समस्या का चुनाव किसी ना किसी सीमा तक शोध की व्यक्तित्व संबंधित पृष्ठभूमि से प्रभावित होता है। ऐसा शोध जो समाज की नजर में पूर्णरूपेण अनुपयोगी है बेकार माना जाता है। यहां तक कि विशुद्व शोधकर्ता भी समाज कल्याण के उद्देश्यों को अपने ध्यान में रखते हैं। साथ ही समाज के लिए विनाशकारी प्रभाव रखने वाले शोध कार्य को प्रतिबंधित करने का प्रयास करते है।
                एक शोधकर्ता को शोध समस्या के चयन से पूर्व स्वयं से प्रश्न पूछने चाहिए जो निम्नानुसार होंगें ।
1  क्या शोध शीर्षक ऐसा है जिस पर कोई कार्य पहले किया जा चुका है। यदि हां तो क्या इस कार्य का कोई लिखित रूप उपलब्ध है। यदि हां तो क्या वह शोधकर्ता की पहुंच में है।

2  क्या शोध-शीर्षक ऐसा है जिसके प्रति समाज द्वारा विरोध प्रकट किया जा सकता है।
3  क्या शोध के परिणामों से शोधकर्ता स्वयं भी आय, यश आदि के रूप में कुछ लाभ प्राप्त कर सकते हैं।
4  क्या शोध शीर्षक समाज के उपयोगी है। क्या इसके परिणाम शोधकर्ता की व्यक्तिगत अभिरूचियों, इच्छाओं मूल्यों और मान्यताओं के अनुकूल है।
5  क्या शोध शीर्षक प्रायोगिक है अर्थात् इस शीर्षक पर शोध कार्य करने के लिए आवश्यक तथ्य की उपलब्धता संभव हो सकेगी
परिस्थिति विश्लेषण अथवा क्षेत्र निर्धारण -
    प्रत्येक शोधार्थी को परिस्थिति विश्लेषण और अपने शोध के क्षेत्र निर्धारण के लिए निम्नलिखित सीमाओं पर भी विचार करना चाहिए।
1 ज्ञान की शाखा विशेष की सीमाएं - ज्ञान की प्रत्येक शाखा का विभाजन एक विशेष ढंग से किया जाता है। इसी लिए शोधकर्ता को जिस विषय में ज्ञान है उसी विषय में शोध का चयन करना चाहिए ।
2 भौगोलिक सीमाएं-  शोधकर्ता को बजट और सुविधा के मुताबिक विषय का चुनाव करना चाहिए ताकि शोध के लिए दुर्गम स्थान पर न जाना पड़े।
3 समय सीमा - समाज और शोध के विषय परिवर्तनशील है, इसलिए किसी विषय के चयन के दौरान उसकी समय सीमा को ध्यान रखा जाना चाहिए।

शोधार्थी के समक्ष आने वाली प्रमुख समस्याएं-
1  भारत जैसे विकासशील देश में शोध के लिए संसाधनों की कमी और वैज्ञानिक तौर तरीकों के अभाव में शोधकर्ता को कई समस्याओं का सामना करना पड़ता है । हालात यह है कि बिना प्रशिक्षण और ज्ञान के ही अनेक लोग शोधकार्य में संलग्न होते है। इसके अलावा सही मार्गदर्शन करने वाले अनुभवी लोगों की कमी भी शोधार्थी के सामने एक बड़ी समस्या है। भारत में शोध कार्य करने के लिए अनुकूल माहौल और नियमित प्रशिक्षण का भी अभाव देखने को मिलता है। जिसके चलते शोध प्रविधि एवं विषय के चयन संबंधी समस्या से शोधार्थी को रूबरू होना पड़ता है।
2  शोधार्थी और शासकीय विभागों में परस्पर समन्वय के अभाव के कारण विभागों में जमा दूसरी शोधार्थी तक नहीं पहुंच पाती है और संदर्भित आंकड़ों  में कमी हमेशा बनी रहती है। इसके लिए विश्वविद्यालय और शोध संस्थान द्वारा वहां के शोधों की जानकारी वाले कार्यक्रम का आयोजन भी नहीं होता है।
3  कई परिस्थितियों में प्रकाशक पुरानी शोधों की गोपनियता बनाए रखने के लिए प्रकाशित नहीं करता है। इसके अलावा अनेक संस्थानों की कार्यप्रणाली कुछ इस तरह की होती है जिसके चलते वे अपनी जानकारियों को दुरूपयोग होने के डर से सार्वजनिक नहीं करते । ऐसा कोई उपाय इन संस्थानों के द्वारा नहीं किया जाता जिससे वे अपनी जानकारियों को निर्भिकता के साथ सार्वजनिक कर सकें। ये भी एक कारण है। जिसके चलते  शोधार्थियों को समस्या का सामना करना पड़ता है।
4  लिखित रूप मे सूची उपलब्ध न होने के कारण एक ही विषय पर कई बार शोध कर लिया जाता हैं । अतः शोध के विषयों की सूची ना होना भी शोधकर्ता के सामने एक बड़ी समस्या है।
5  शोध किस तरह किया जाए इसके लिए अभी तक कोई कानून या आचार संहिता नही बनाए गए है। आपस में दो विश्वविद्यालय और विभिन्न संस्थानों के मध्य सूचनाओं के आदान प्रदान की भी कोई आचार संहिता नही बनाई गई है।,इसके कारण आचार संहिता के बगैर ही शोध को अंजाम देना पड़ता है।
6  भारत मे शोधार्थी को एक और समस्या का सामना करना पड़ता है वह है सहायक सुविधा और कम्प्यूटर के प्रयोग का अभाव स्वयं के सिद्धहस्त न होने के कारण उसे इन सब पर निर्भर रहना पड़ता है उसके कारण समय अधिक लगता है। विश्वविद्यालय अनुदान आयोग इस समस्या को दूर करने के लिए बेहतर कदम उठा सकता है।
7  अनेक शहरों में पुस्तकालय की कमी भी एक बड़ी समस्या है। ज्यादातर शहरों में इनका अभाव है जहां पुस्तकालय उपलब्ध है वहंा भी पुस्तकों और संर्दभ ग्रंथों की कमी का सामना शोधार्थी को करना होता है। इन सब कारणों की वजह से शोधार्थी को ज्यादा समय और उर्जा का प्रयोग आंकड़ों की खोज और एक़ित्रकरण में करनी पड़ती है।
8  यह भी देखने में आता है कि ज्यादातर लायब्रेरी में पुराने नियमों और कानून की जानकारी उपलब्ध नही होती है। इस समस्या से निपटने के लिए सरकारी प्रकाशन को शोध संबंधित दस्तावेज सभी पुस्तकालयों में जल्दी से जल्दी उपलब्ध करवाने चाहिए।
9  शोध के दौरान जरूरत पड़ने पर सरकारी प्रकाशन और अन्य संस्थानों द्वारा प्रकाशित रिपोर्ट और आंकड़े समय पर उपलब्ध नही करवाए जाते हैं। शोधार्थी को एक और समस्या का सामना करना पड़ता है वह है आंकड़ो से संबंधित प्रकाशित महत्वपूर्ण तथ्यों का न मिल पाना।
10  तथ्यों के एकत्रिकरण के दौरान नए विचारों की कमी भी एक समस्या होती है। इसके अलावा तथ्यों और आंकड़ों के एकत्रिकरण में अपनाई जाने वाली प्रक्रियाओं की कमी भी एक बड़ी समस्या हैअनिल अत्री ........

Wednesday, May 2, 2012

दिल्ली में एक बार फिर लिंग काटकर जबरन किन्नर बनाने का मामला


एंकर - दिल्ली में एक बार फिर लिंग काटकर जबरन किन्नर बनाने का मामला सामने आया ...एक शख्स एक किन्नर से प्यार करने लगा और दोनों ने शादी की तैयारी कर ली ..पर किन्नर के गुरु को ये बात नागवार गुजरी और किन्नर से प्यार करने वाले शख्स को नशीली चीज खिलाकर उसका लिंग काटकर उसे बना दिया नपुसंग ..नापुसंग हुआ ये शख्स व इसकी प्रेमी किन्नर दोनों इंसाफ के लिए गुहार लगा रहे है ..मंगोलपुरी थाना पुलिस ने शिकायत तो ली है और FIR दर्ज करने कि बजाय जांच कि बात कह रही है ..
वी ओ -१ पिछले वर्ष दिल्ली के मंगोलपुरी से किन्नर बनाने वाला एक डॉक्टर पुलिस ने किया था गिरफ्तार ...वो डॉक्टर जबरन लाए  गए लोगों को बेहोश कर उनका लिंग काटकर उनको किन्नर बनाकर किन्नर जाति में भेजने का काम करता था और एक किन्नर ग्रुप इसको मदद का रहा था जिसे पुलिस ने सलाखों के पीछे पहुंचा दिया था ..लेकिन बाहरी दिल्ली में फिर एक ऐसा ही मामला आया ..क्या ऐसे डॉक्टर अब भी मंगोलपुरी में मौजूद है या खुद किन्नरों ने इस वारदात को अंजाम दिया है ..दरअसल पैसे से ड्राइवर अजय सिंह ( बदला हुआ नाम ) नाम का ये 24  साल का शख्स इस सोफिया नाम की किन्नर से प्यार करता था ..दोनों एक दूसरे को दिल से चाहने लगे ..दोनों  बाहरी दिल्ली के मंगोलपुरी में रहते है ..दोनों ने शादी करने की ठान ली ..ये बात किनर ने अपने समाज को भी बताई पर किननर समाज को इस पर एतराज था ...गत २६ अप्रैल को अजय सिंह को सोफिया की गुरु किन्नर सोनिया ने खाने पर बुलाया ..सोनिया उत्तर प्रदेश से आई थी ..और अजय को खाना खाने के बाद कोई होश नही था ...27  अप्रैल की शाम एक दिन बाद सोनिया व कुछ किन्नर अजय सिंह को उसके घर छोड़ने आये ..और अजय सिंह ने देखा की उसके गुपतांग गायब है ..और सोनिया ने किसी को बताने पर जान से मारने की धमकी दी ..अजय सिंह डर गया ..अजय का लिंग कट चुका था ..अजय नपुसंग बन चुका था ..
बाईट - अजय सिंह ( पीड़ित )
वी ओ २ - सोफिया भी प्रेमी के साथ हुए इस हादसे से सदमे में है ..और अपनी गुरु को कोस रही है और अपनी गुरु सोनिया पर कारवाई की मांग का रहरी है ...
बाईट - सोनिया ( पीड़ित की प्रेमिका किन्नर )
वी ओ  तीन दिन तक अजय डर के मारे घर पड़ा रहा ..कोई कही शिकायत नही की पर तीन दिन बाद अजय को कुछ आसपास के लोगों ने होसला दिया वह तीन दिन बाद पुलिस में आया ...पर पुलिस को तीन दिन बाद आने से शक हुआ कि कही शख्स ने जानबुझकर अंजाम तो नही दिया दरअसल पुलिस FIR दर्ज करने से पहले आरोपी सोनिया से पूछताछ करेगी और आरोपी सोनिया वीरवार दोपहर बाद दिल्ली पहुंच पाएगी ...पुलिस ने पीड़ित का मेडिकल करवा लिया है शिकायत ले ली है और FIR के लिए सोनिया के बयानों का इन्तजार है .......अब देखने वाले बात होगी की पुलिस कैसे इस तरह हादसे रोक पाती है क्यकी बाहरी दिल्ली में इससे पहले भी के ऐसे मामले हो चुके है .........
Visual - पीड़ित व उसकी प्रेमिका किन्नर कि बाईट ..
              पुलिस स्टेशन के आते जाते शोट ...
              अस्तपताल के विसुअल ..
              आरोपी सोनिया का फ़ाइल फोटो ..
अनिल अत्री   दिल्ली .............




Saturday, March 31, 2012

बुराडी विधानसभा के तीन वार्डों में दोपहर तक हार जायेगी कोंग्रेस

बुराडी विधानसभा के तीन वार्डों में दोपहर तक हार जायेगी कोंग्रेस
बुराडी विधानसभा में टिकटों के बंटवारे को लेकर सबसे बड़ा नुकशान कोंग्रेस को होगा टिकट बंटवारे में एक्टिव कार्यकर्ताओं कि अवेहलना पडेगी महेंगी ... यहा कोंग्रेस में सबसे ज्यादा बगावत है ..बुराडी वार्ड में चार वार्डों में से तीन पर कोंग्रेस कि हालत पतली है ..बुराडी के चारों वार्डों में सबसे पहले झडोदा वार्ड कि बात करते है यहा टिकट चाहने वालों कि लम्बी लाइन थी ..इस लाइन में चौधरी कुलदीप सिंह , चौधरी धर्मवीर सिंह , धर्मेन्द्र सिंघल पिन्क्की थे . इन चारों ने पिछले कई सालों से जी जान एक कर रखी थी हर गली सड़क कूचे पर आपको इनके होर्डिंग व पोस्टर मिलेगें जिनमे कोंग्रेस सांसद एवं प्रदेश अधक्ष जय प्रकाश अगरवाल का गुणगान किया है . यहा तक कि एरिया में इन लोगों ने निजी पैसे से काम भी कराए . कुलदीप चौधरी ने तो डेढ़ साल से अपने निजी ४० सफाई कर्मचारी भी लगा रखे है ओर अच्छी पहचान बना ली .. लोगों के दुःख सुख से ये चारों लोग आगे मिलते थे क्योकि इनको टिकट कि चाह थी ..जब टिकट मिलने का वक्त आया तो एक ऐसे शख्स को टिकट दे दिया गया जिसे कभी पार्टी के सम्मेलनों में देखा भी नही गया .कभी पार्टी के लिए काम भी नही किया ..चौधरी कुलदीप सिंह ने बताया कि जिस लोकेन्द्र सिंह को टिकट दिया गया है वह कभी पार्टी के अधिवेशनो में नही गया ..पार्टी के लिए काम नही किया ..यहा तक कि उसके पूरे परिवार ने कभी पार्टी के चुनावों में अपने वोट तक नही ढाले ..इससे अंडर के खाते सभी कार्यकर्ता नाराज है ..अंदर कि नाराजगी से पूरे वार्ड के लोग वाकिफ है ओर वे इसका विरोध कर रहे है ..अंदर के खाते चौधरी कुलदीप ने अपने भाई को चुनाव लडवा दिया है अब लोग समझ रहे है कि कुलदीप का भाई चौधरी जगदीप सिंह कुलदीप के ही इशारे पर खड़ा हुआ है ओर उसकी ओर रुझान हो गया है ..कुलदीप चौधरी ने बताया कि उनके पूरे गाव ने पंचायत कर जगदीप का समर्थन कर दिया है .. यहा भाजपा से गौरव खारी का वर्चस्व था ..अच्छी पहचान थी माजूदा निगम पारश्द था ओर युवा भी ..साथ ही वो गुर्जर था ओर इस वार्ड में करीब सात हजार गुर्जर वोट भी है ..लेकिन भाजपा ने भी इस गुर्जर नेता गौरव खारी कि जगह वार्ड से बाहर के कंडीडेट राजपाल राणा को टिकट दे दिया ..राजपाल राणा मुखमलपुर गाव से है जो इस वार्ड से बाहर है लेकिन उसके वार्ड में लेडिज सीट होने कि वजह से वे यहा इस वार्ड में आ पहुंचे इसका खामियाजा भाजपा को भुगतना पडेगा ..अब यहा कोंग्रेस व भाजपा दोनों कमजोर पड़ गई है ओर बसपा का यहा वजूद नाममात्र है क्योकि पिछले चुनाव में यहा बसपा नौवे स्थान पर रही थी ..अब यहा कोंग्रेस के विरूद्ध लहर होने से इतना साफ है कि कोंग्रेस दोपहर तक ही हार जायेगी .

... अब बात करते है बुराडी वार्ड कि यहा भाजपा से माजूदा निगम पार्षद बिमला त्यागी है ओर कोंग्रेस से नया चेहरा सामने आया है जो महिला खुद एक्टिव नही उसके पति जरूर पार्टी में सक्रिय है पर उनकी पत्नी अमन त्यागी का लोगों ने नामा भी नही सूना आता ओर अमन त्यागी को कोंग्रेस ने टिकट दे दिया इसका खामियाजा भी यहा कोंग्रेस को भुगतना पडेगा ..यहा भी पार्टी के कई दूसरे कार्यकर्ता नाराज जिससे कोंग्रेस को भारी नुकशान होगा . यहा भाजपा से बिमला त्यागी का नाम है लेकिन अधिकतर लोग बदलाव चाहते है ओर माजूदा निगम पार्षद होने कि वजह से बिमला से लोग किनारे करने का अमन बना चुके है ..यहा भाजपा से रेखा सिन्हा पिछले चुनाव में मात्र दो सो वोटो से हारी थी ..ओर बिमला त्यागी इनेलो से जीतकर भाजपा में आई थी . अब रेखा सिन्हा का वोट बैक बिमला को स्वीकार करे ये मुश्किल होगा . साथ ही भाजपा के लिए सबसे बड़ा नुकशान बुराडी में पहाड़ी वोटो से होगा ..यहा उत्तरांचल इन्क्लेव . प्रधान इन्क्लेव ओर भी कई कालोनिया पहाड़ी लोगों कि है ओर करीब अठारह हजार वोट पहाड़ी लोगों के है ओर पहाड़ी लोगों का झुकाव भाजपा कि तरफ ही होता है यहा इस पहाड़ी वोट बाहुल्य वार्ड में पहाड़ी लोगों ने एकजुट होकर कोंग्रेस व भाजपा दोनों से एक पहाड़ी के लिए टिकट माँगा लेकिन दोनो ही पार्टियों ने पहाड़ी लोगों टिकट नही दी ..इससे पहाड़ी लोगों ने एकजुट होकर अपना अलग से प्रत्यासी खड़ा कर दिया ..अब पहाड़ी प्रत्यासी राधा पंवार को ये लोग सर्व सम्मति से निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में लाये है ..अब पहाड़ी लोगों कि कई पंचायते हो चुकी है ओर कालोनियों से समर्थन मांग रहे है ..काम न होने कि वजह से बुराड़ी के त्यागियों को कालोनियों के अधिकतर लोग वोट नही देगे .. यहा भाजपा व कोंग्रेस दोनो से उम्मेदवार बुराडी से त्यागी परिवारों से है ओर त्यागी वोट दोंनो में बंट जाएगा ओर कालोंयों के लोग अब निर्दलीय उम्मीदवार राध पंवार का समर्थन समर्थन कर सकते है यहा भी कोंग्रेस व भाजपा कि हार नजर आ रही है ..लेकिन प्रधान इन्क्लेव में कुछ पहाड़ी लोगों ने बिमला त्यागी का समर्थन किया ओर कहा कि हम सभी पहाड़ी लोग राधा पंवार के साथ नही हम बिमला त्यागी के कामों से खुश है ..

बुराडी विधानसभा में मुकुंदपुर वार्ड में कोंग्रेस , भाजपा व लोजपा में टक्कर है ..मुकुंदपुर वार्ड में मौजूदा निगम पार्षद लोजपा से गुलाब सिंह राठौर है ओर राठौर का अपना वोट बैक है ..पूर्वाचल वोट पर गुलाब सिंह का अच्छा दबदबा है ..पूर्वांचल बाहुल्य ये वार्ड है ओर इस कारण दोबारा गुलाब सिंह आना तय था पर यहा कोंग्रेस व भाजपा ने पूर्वांचल के शख्स को टिकट देकर गुलाब सिंह को भी मेहनत के लिए मजबूर कर दिया ..इस वार्ड में कोंग्रेस के लिए अपने ही कार्यकर्ताओं कि ही समस्या है यहा अंदर के खाते कई कोंग्रेसी पार्टी से खफा है .. यह कोंग्रेस से राम श्रीवास्तव को टिकट मिली है राम श्रीवास्तव पहले लोजपा पार्टी में थे ओर दो महीने पहले ही कोंग्रेस में आये थे ओर इस नए चेहरे को टिकट दे दिया गया ओर पुराने कार्यकर्ता इस बात से नाराज है यदि इन नाराज लोगों ने पार्टी के विरूद्ध प्रचार किया तो यहा कोंग्रेस कि लुटिया डूबनी तय है ..

बुराडी विधानसभा में चोथा वार्ड है भलस्वा जहागिर्पुरी यहा ये एकमात्र एक सीट है जहा कोंग्रेस कि जीत नजर आ रही है यहा इस वार्ड में मोजुदा निगम पार्षद भाजपा के रामकिशन बंसीवाल है ओर कोंग्रेस के निगम प्रत्यासी सुधीर पारचा मात्र आठ वोट से हारे थे ..अब दोबारा फिर रामकिशन बन्सीवाल व सुधीर पारचा दोनों मैदान में है ..लोगों में हारे हुए सुधीर पारचा से सहानुभूति है ओर मात्र आठ वोट से हारे थे अब इस सीट पर जरूर कोंग्रेस की जीत नजर आ रही है ..

अब बुराड़ी विधानसभा में कोंग्रेस चार में से तीन सीटे खोती नजर आ रही ..आने वाली १५ अप्रैल को जनता इन उम्मीदवारों के भाग्य का फैसला करेगी ....

Anil Atri Delhi.....................


Wednesday, March 21, 2012

दिल्ली में MCD इलेक्शन कि सरगर्मिया तेजी प





Video in Link

दिल्ली में MCD इलेक्शन कि सरगर्मिया तेजी पर है ..पांच साल पहले चुने गये निगम पार्षद चुनाव के वक्त भी जनता का दिल नही जीत पा रह है ..कारण है इलाकों में आज भी सफाई न होना , गलियाँ न बन पाना , कूड़ा व आवारा पशुओं कि समस्या ....बुराड़ी इलाके का झड़ोदा वार्ड नम्बर आठ यहा से मजुदा वक्त में भाजपा के निगम पार्षद है पर यहा गलियों नालियों कि पांच साल से सफाई नही हुई तो लोगों ने निजी तौर पर सफाई शुरू कि तो इतना कूड़ा इन नालियों से निकल रहा है जिसे देखकर अंदाजा लगाया जा सकता है कि लोग यहा कितने खुश है ...आज आपको दिखाते है झड़ोदा वार्ड नम्बर आठ का हाल .....
http://youtu.be/6zyc9ERMCR0

Friday, February 10, 2012

विषय - बुराडी विधानसभा में कैट्स एम्बुलेंस लगवाने हेतू.

सेवा में,
श्रीमान स्वास्थ्य सचिव दिल्ली सरकार ,
सचिवालय नई दिल्ली .
विषय - बुराडी विधानसभा में कैट्स एम्बुलेंस लगवाने हेतू.
श्रीमान जी,
सविनय निवेदन यह है कि दिल्ली सरकार द्वारा संचालित कैट्स ( CATS ) एम्बुलेंस पूरी दिल्ली में कार्यरत है जो हर प्रकार की आपातकाल की स्थिति में निशुल्क सहयोग करती है ओर साथ ही पी सी आर ( PCR ) के साथ मिलकर अपनी सेवाए प्रदान करती है जिसमें सो नम्बर ( 100 ) पर की जाने वाली सभी कोल वायरलेस द्वारा कैट्स एम्बुलेंस को भी मिलती है ओर कैट्स एम्बुलेंस उन आपातकालीन कोलों को डील करती है. ये कैट्स एम्बुलेंस गर्भवती महिलाओं के प्रसव के दौरान भी निशुल्क सेवा प्रदान करती है.
श्रीमान जी हमारी बुराडी विधानसभा उत्तरी दिल्ली में स्थित है ओर पूरी विधानसभा में वर्तमान तक एक भी सरकारी अस्पताल कार्यरत नही है ओर साथ ही पूरी विधानसभा में एक भी कैट्स एम्बुलेंस का बेस नही है.
बुराडी विधासभा के गाँव , बुराडी गाँव से भी दस किलोमीटर आगे तक है यदि कोई दुर्घटना बुराडी एरिया में होती है तो कैट्स एम्बुलेंस की गाडी आई एस बी टी ( ISBT ) ट्रोमा सेंटर या फिर या जहागीरपुरी के बाबु जगजीवन राम अस्पताल से आती है जिसे घटना स्थल तक पहुंचने में करीब करीब एक घंटे का समय लग जाता है आई एस बी टी ट्रोमा सेंटर से आने वाली कैट्स एम्बुलेंस को मजनू का टीला , वजीराबाद , गोपालपुर , बुराडी रेड लाईट , बुराडी अथोरटी व संतनगर के भारी जाम को पार करके आना पड़ता है जिससे कैट्स एम्बुलेंस की गाडी को घटना स्थल तक पहुंचने से पहले ही घायल या मरीज कैट्स एम्बुलेंस के इन्तजार में दम तोड़ चुके होते है या फिर उनकी हालत बद से बदत्तर हो चुकी होती है.
अत: आपसे निवेदन है की आप बुराडी विधानसभा में कैट्स एम्बुलेंस के दो बेस पहला बुराडी गाँव में तथा दूसरा उससे भी आगे स्थित नत्थूपुरा गाँव में बनाने की कृपा करे . बुराडी में कैट्स एम्बुलेंस के बेस के लिए बुराडी मुख्य सड़क पर बने दिल्ली नगर निगम के जच्चा बच्चा केन्द्र को भी प्रयोग में लाया जा सकता है ओर नत्थूपुरा में मुख्य सड़क पर बनी दिल्ली सरकार की डिस्पेंसरी को भी प्रयोग में लाया जा सकता है. आपसे निवेदन है कि आप हमारी ये मांग पूरी करने कि कृपा करे . आपकी अति कृपा होगी .
धन्यवाद .
भवदीय -
अनिल अत्तरी
Burari Delhi-84
anilattri.reporter@gmail.com

Saturday, February 4, 2012

दिल्ली में फिर एक माँ ने बच्ची को लावारिस छोड़ी


एंकर - दिल्ली में फिर एक माँ ने बच्ची को लावारिस छोड़ी ...नवजात बच्ची को छोडकर बच्ची कि माँ अस्पताल से फरार ..अस्पताल में दिया गया महीला का पता मिला गलत ....बच्ची ठीक हालत में नरेला के सत्यवादी हरिश्चंदर अस्पताल में भर्ती ..माँ का अभी तक कोई सुराग नही अस्पताल ने पुलिस को कि शिकायत .....
वी ओ 1 देखिये ये बच्ची कितनी प्यारी है ....चेहरे पर कितनी मुश्कान ....अब ये बच्ची बोल तो नही पा रही है पर अपनी माँ से ये सवाल मन ही मन जरूर कर रही होगी कि क्यों इनको जन्म लेते ही माँ ने त्याग दिया ....ये पूछ रही होगी कि माँ मेरा क्या कसूर था कि मुझे हन्म लेते ही अनाथ बना दिया .....माँ इसमें मेरा क्या कसूर है ....मेरा क्या यही कसूर है कि मेने माँ तेरी कोख से जन्म लिया ....अब इस बछ्ची को अपने माँ बाप का इन्तजार है ...दरअसल 2 फरवरी को रात दो बजे एक महीला डिलीवरी के इलाज के लिए आई और उसी रात अस्पताल में इस महीला कि डिलीवरी हुई ....महीला ने अपना नाम गुडिया दर्ज कराया ..इस महीला ने एक बच्ची को नोर्मल जन्म दिया और बच्ची भी पूरी तरह स्वस्थ .....तीन फरवरी कि शाम सात बजे गुडिया नाम कि ये महीला अचानक गायब हो गई ..अस्पताल ने तुरंत पुलिस को सुचना दी ..पुलिस ने गुडिया द्वारा लिखाए पते पर गुडिया को तलास किया लेकिन वो पता ही गलत मिला ..महीला ने पता ए बलोक होलम्बी कला House No 2546 लिखाया था जो गलत मिला ....अब चार फरवरी शाम तक भी बच्ची कि माँ का पता नही चल पाया है ...
बाईट - डॉ चंदर कान्त ( एम् एस सत्यवादी हरिस्चंदर अस्पताल ) - दो तारीख को ये महीला आई थी नोर्मल डिलीवरी हुई तीन कि शाम को अचानक गायब हो गई ....हमने तुरंत पुलिस को सुचना दी ...बच्ची बिल्कुल ठीक है नोर्मल है और अब नर्सरी कि भी जरूरत नही है ..
वी ओ 2 अब अस्पताल के सामने भी यही समस्या है कि अब बच्ची को अस्पताल कि जरूरत नही फिर भी बच्ची अस्पताल में भर्ती है .बच्ची को माँ कि जरूरत है पर माँ इस बच्ची कि गायब है ..अब तक पुलिस को भी बच्ची के परिवार का कोई सुराग नही मिला है ...अब अस्पताल भी पुलिस से लिखित रूप में ये अनुरोध कर रहा है कि वे इस बच्ची के माँ -बाप कि तलास कि जाये और यही माँ बाप नही मिल पाते तो इस बच्ची के आगे कैसे व कहा भेजा जाये ये सुनिश्चित करना जरूरी है ..अब अस्पताल बच्ची को कहा भेजे ..और यदि पुलिस खुद इस बच्ची को कही नही भेज पाती तो अस्पताल के NOC दे ताकि अस्पताल बच्ची को किसी अच्छे अनाथलय में भेज सके ..
बाईट - बाईट - डॉ चंदर कान्त ( एम् एस सत्यवादी हरिस्चंदर अस्पताल ) टेक्स्ट- हम अब पुलिस से ये रिक्वेस्ट करते है कि बच्ची के माँ -बाप कि तलास कि जाये और यही माँ बाप नही मिल पाते तो इस बच्ची के आगे कैसे व कहा भेजा जाये ये सुनिश्चित करना जरूरी है ..अब अस्पताल बच्ची को कहा भेजे ..और यदि पुलिस खुद इस बच्ची को कही नही भेज पाती तो अस्पताल के NOC दे ताकि अस्पताल बच्ची को किसी अच्छे अनाथलय में भेज सके ..
वी ओ 3 अब इसे समाज का गिरता सत्तर कहे या कुछ और क्योकि अकेली राजधानी में एक महीने के भीतर ही चौकाने वाले ये कई मामले सामने आये है बाहरी दिल्ली के ही बवाना में दो दिन पहले एक आशा नाम कि महीला ने अपनी दो मासूम जुडवा बच्ची तेज बहती नहर के किनारे छोड़ दी और फिर ये बच्ची नहर में जा गिरी थी और लोगों ने दोंनो बच्चियों को बचा लिया था ...दूसरी तरफ फलक भी जिन्दगी व मौत के बीच जूझ रही है .... अब ये देखने वाली बात ये होगी कि नरेला पुलिस बच्ची के परिजनों को तलास कर पाती है या नही ..और इस बच्ची का क्या भविष्य हो होगा ......
अनिल अत्री दिल्ली ..............